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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')

DevanagariHindipublished334 pages

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2 भूमिका
होने लगे । तात्पर्य यह कि व्यक्त के आधार पर किया गया अव्यक्त का अन्वेष
आंशिक होता है, अपूर्ण होता है और कभी-कभी अनुचित व अप्राकृतिक भी ।
यह विश्लेषण प्राचीन भारत के सम्बन्ध में प्राप्त साधनों पर पूर्णतः घटता है ।
अभी तक प्राचीन भारत का या तो आंशिक ज्ञान प्राप्त हुआ है या अनुचित रूप
देकर उसे अभिव्यक्त कर दिया गया है । कारण यही प्रतीत होता है कि प्राप्त
विषयों में मानव का मन इतना बँध गया कि वह उसके पीछे की बात
देखने का परिस्थितिवश साहस ही नहीं कर पाता । प्राप्त विषय को प्रस्तुत रूप में
किसने, क्यों और कैसे रक्खा, इसका विचार स्पष्टतः कोई कर नहीं पाता ।
कोई कहता है कि अपने स्वार्थ के लिए रक्खा, कोई कहता है कलाकार अदृष्ट
रूप से आ मिले, कोई कहता है प्राकृतिक शक्तियों ने तोड़-फोड़कर वह रूप दे
दिया, तो कोई कहता है ईश्वर ने लोक-हितार्थ वैसा कर दिया । परन्तु
बात यह है कि मानव ने जान-बूझकर प्रस्तुत रूप प्रदान किया है, मनोनुकूल
ढंग से सब का निश्चय किया है, परिस्थितिवश प्राप्त वस्तुओं को भिन्न-भिन्न रूपों में
देखने का प्रयत्न किया है, विभिन्न वर्णों के चश्मों को पहनकर विभिन्न वस्तुओं को
विभिन्न दृष्टिकोणों से देखकर अपने-अपने निष्कर्षों को अभिव्यक्त किया है।
अन्यथा एक ही विषय पर विभिन्न विद्वानों के विभिन्न मत कैसे होते, एक ही
विषय को लेकर विभिन्न विचारों पर पहुँचकर वाक्-युद्ध क्यों करते ?
मानव-जीवन की यथार्थता को सूचित करते हुए विभिन्न भाषाओं में
विभिन्न रूपों में विचारकों ने अपने-अपने भाव अभिव्यक्त किये हैं । ये साधारणतः
तात्कालिक परिस्थितियों के फलस्वरूप उद्भवित जन-कल्याण के लिए निर्मित
भाव-विशेष हैं जो जनता के विकास में यथेष्ट रूप से साधक सिद्ध हुए हैं ;
परन्तु वे ही भाव-विशेष विभिन्न युद्धों के लिए तथा वैमनस्य उत्पन्नकरने में भी
साधक सिद्ध हुए हैं जिनके कारण जन-कल्याण व लोक-विकास में यथेष्ट बाधा
उपस्थित हो चुकी है । संसार के साहित्य में ऐसे ग्रन्थ विरले ही हैं जिनके