तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')
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Read in context॥ भूमिका ॥
पॉल ब्रण्टन ने ‘ गुप्त भारत की खोज¹ , का वर्णन करते हुए आधुनिक
भारत में जो उसे अनभिव्यक्त प्रतीत हुए, और जिन्हें वह संसार के सम्मुख उपस्थित
करना चाहता था उन्हें अपने मनोनुकूल ढंग से लिपि-बद्ध किया है । परन्तु अभी
तक प्राचीन भारत की खोज करके उस काल की स्थिति एवंमानव-जीवन का
विश्लेषणात्मक वर्णन किसी ने नहीं किया है । यह कार्य है भी अत्यन्त दुष्कर ।
माना जाता है कि इसके लिए साधन या तो हड़प्पा व मोहें-जो-दड़ो आदि की
खुदाई है, या प्राचीन शिलालेख व खण्डहर आदि हैं, या प्राचीन काल से
आती हुई किंवदन्तियाँ व लोक - कथाएँ व गीत हैं, या वेद, पुराण, महाभारत,
रामायण, तोल्काप्पियम, संघम-साहित्य आदि । प्राप्त वस्तु से ही अप्राप्त की
कल्पना व गणना होती आयी है । यही वैज्ञानिक माने जाने पर भी वस्तुतः यह
प्रणाली यथेष्ट नहीं है । यह कहना उपयुक्त ही है कि प्रकाश के कारण ही हमें
अन्धकार का अनुभव होता है ; यह कहना ठीक ही है कि अज्ञान के कारण ही
ज्ञान का भान होता है ; यह कहना उचित ही कि सद्गुण के कारण ही
दुर्गुण से हम दूर जाने की इच्छा करते हैं ; यह कहना माननीय ही है कि
सुख का अनुभव करने के पश्चात् ही कोई दुख से मुँह मोड़ता है ; यह कहना
युक्तियुक्त ही है कि मृत्यु को देखकर ही मानव जीवन की ओर अधिकाधिक
आकर्षित होता है, परन्तु यह भी सम्भव है कि कोई प्रकाश में इतना तन्मय
हो जाय कि उसे अन्धकार का विचार ही न उत्पन्न हो, अज्ञान में इतना ग्रस्त हो
जाय कि ज्ञान का उसे भान ही न हो, सद्गुणसम्पन्न इतना हो कि दुर्गुण उसे
कहीं न दिखायी पड़े, सुख में इतना डूबा हो कि उसे दुख का पता ही न चले,
और मृत्यु को देखकर इतना विचलित हो जाय कि उसे जीवन ही मिथ्या प्रतीत
- ‘ Search in Secret India ’—Paul Brunton