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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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अपरिचित था। उनकी कल्पना में भी कभी यह बात नहीं आई थी कि उनके राज्य में भी
ऐसी वृद्धा रहती है। ऐसी विवश और अकल्पनीय स्थिति में भी लोग साँस ले सकते हैं,
यह अब तक उनके अनुभव क्षेत्र में नहीं आया था।
साधुवेशी तेनाली राम ने महाराज कृष्णदेव राय के साथ चलते हुए अपनी बातें जारी
रखीं। उसने महाराज से कहा, “राजन! यह वृद्धा कुष्ठ रोगी है और अपने परिजनों द्वारा
बहिष्कृत है। गाँववालों ने इस वृद्धा के ग्राम प्रवेश को वर्जित कर दिया है कि कहीं इस वृद्धा
के सम्पर्क में आने से कोई अन्य इस गलित रोग का शिकार हो जाए। ऐसी अनेक
वास्तविकताओं से परिचित होने के बाद ही तुम अपने राज्य की सम्पदा का सही उपयोग
करने के योग्य बन सकोगे!”
बातें करते हुए दोनों घोड़े के पास आ चुके थे। तभी साधुवेशी तेनाली राम ने पूछा, “क्यों
राजन! अपने राज्य की इन वास्तविकताओं से परिचित होने के बाद तुम्हें कैसा लग रहा है?
क्या तुम समझ पा रहे हो कि राज्य की सम्पदा का उपयोग कैसे और कहाँ होना चाहिए?”
महाराज कृष्णदेव राय से रहा नहीं गया। वे अपने वैभव-प्रदर्शन के निर्णय के कारण
लज्जित थे और अपने राज्य के पीड़ित जनों को देखकर द्रवित हो उठे थे। पश्चात्ताप-भरे
स्वरों में उन्होंने कहा, “महाराज! आपने मुझे प्रजाजनों को देखने की नवीन दृष्टि दी है। मैं
आपका ऋणी हूँ।” ऐसा कहकर वे विनीत भाव से साधुवेशी तेनाली राम के पैरों पर गिर
पड़े, “मुझे क्षमा करें महाराज! मैं अहंकार के वशीभूत होकर दर्प भरा निर्णय ले बैठा।”
साधुवेशी तेनाली राम ने महाराज को कन्धा पकड़कर उठाया और अपने वास्तविक स्वर
में बोल पड़ा, “अरे...अरे महाराज! ऐसा न करें! मैं तो आपका सेवक तेनाली राम हूँ।” ऐसा
कहते हुए तेनाली राम ने अपने जटाजूट और दाढ़ी-मूँछ उतारकर अपना वास्तविक चेहरा
महाराज कृष्णदेव राय को दिखा दिया।
महाराज ने उसे गले लगाते हुए कहा, “तुमने मेरी आँखें खोल दीं, तेनाली राम!”
फिर, दोनों घोड़े पर सवार होकर राजधानी लौट आए।
विजयनगर के राजप्रासाद में दूसरे दिन से सब कुछ सामान्य हो गया। महाराज कृष्णदेव
राय नियमित दरबार लगाने लगे। उस वर्ष विजयनगर में पहले से भी अधिक उमंग में
विजयोत्सव मनाया गया। विजयोत्सव में सैनिकों की शौर्यकलाओं के प्रदर्शन का कार्यक्रम
रद्द कर दिया गया और पहले की भाँति ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही।