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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

by पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन

Source: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (origin)

DevanagariHindipublished118 pages

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बहुभाषाविद् और तेनाली राम
महाराज कृष्णदेव राय विद्वत्ता-प्रेमी थे। स्वयं स्वाध्याय करते और स्वाध्यायियों की
सराहना भी करते। उनके दरबार में प्रायः विभिन्न राज्यों के विद्वान आते और अपनी
विद्वत्ता का प्रदर्शन कर उनसे उपहार आदि प्राप्त करते। विद्वानों को समा-त करते समय
महाराज को आन्तरिक प्रसन्नता होती।
एक बार महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक ऐसा भाषाविद् पहुँचा जो भाषा के
विकास पर विशेष अध्ययन कर चुका था तथा स्वयं छः-सात भाषाएँ मातृभाषा की तरह
बोल सकता था।
उसने महाराज के सम्मुख उपस्थित होकर कहा, “महाराज! मैं इस देश में बोली
जानेवाली प्रायः समस्त बोलियों और भाषाओं का ज्ञाता हूँ और अनेक भाषाओं पर मेरा
मातृभाषा की तरह अधिकार है। आपको मेरी बातों पर विश्वास हो जाए, इसके लिए
आपके सामने मैं यही बातें विभिन्न भाषाओं में दोहराता हूँ। पहले तमिल में!” और वह
फर्राटेदार तमिल में वही बातें बोलने लगा।
सभी सभासद चमत्कृत से उसे देखने लगे।
“अब तेलगू”!...और तेलगू में भी वह बड़ी सहजता से बोल गया वही बातें!
सभासदों को उसके इस भाषा-ज्ञान पर घोर विस्मय हुआ। महाराज भी उस विद्वान के
भाषा-ज्ञान पर चकित थे और वह बोले जा रहा था।
कभी कन्नड़, कभी उड़िया, कभी मराठी तो कभी गुजराती। महाराज ने स्वीकार कर
लिया कि इस विद्वान के पास अद्भुत सामर्थ्य है। सभासद उसकी सराहना के लिए तालियाँ
बजाने लगे।
इसके बाद उस विद्वान ने महाराज से कहा, “महाराज! अब आपके सभासद इस देश के
किसी भी क्षेत्र में बोली जानेवाली किसी भी बोली में, किसी भी भाषा में बात कर सकते
हैं। मैं उनकी बातों का जवाब उनके द्वारा बोली गई भाषा में ही दूँगा।”
महाराज ने सभासदों को विद्वान से बातें करने का संकेत कर दिया। इसके बाद तो सभा
में रह-रहकर विभिन्न बोलियों में उस विद्वान से बातें होती रहीं और वह सभासदों द्वारा
बोली जानेवाली भाषा में ही जवाब देता। महाराज, तेनाली राम और सभासद सभी उस
विद्वान के इस गुण की सराहना कर रहे थे। सभा भवन में एक भिन्न किस्म का माहौल था।