तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
by पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन
Source: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (origin)
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तेनाली राम अपनी मेधा के बूते विजयनगर के दरबार का सबसे लोकप्रिय सभासद बन
चुका था। एक साधारण विदूषक ने इतनी तरक्की कर ली थी कि उसके सहकर्मी सभासद
उससे ईर्ष्या करने लगे थे। तेनाली राम को किसी चीज का अभाव नहीं था। प्रायः दरबार में
महाराज उसकी बातों से प्रसन्न होकर उसे कुछ-न-कुछ देते रहते थे। सहकर्मियों की ईर्ष्या
का यही कारण था।
एक दिन दरबार में इस बात की चर्चा आरम्भ हो गई कि कोई किसी को कितनी बार मूर्ख
बना सकता है-एक बार, दो बार या बार-बार?
अधिकांश सभासदों की राय थी कि कोई भी व्यक्ति किसी को एक बार तो मूर्ख बना
सकता है, बार-बार नहीं। इस चर्चा में सभी सभासद बढ़-चढ़कर भाग ले रहे थे मगर
तेनाली राम इस चर्चा के प्रति उदासीन था और चुपचाप अपने आसन पर बैठा हुआ था।
महाराज कृष्णदेव राय स्वयं इस चर्चा में रुचि ले रहे थे। अचानक उनका ध्यान इस बात
की ओर गया कि तेनाली राम इस चर्चा में भाग नहीं ले रहा है तथा उदासीन भाव से अपने
आसन पर इस तरह बैठा हुआ है मानो इस चर्चा का कोई अर्थ ही न हो!
सारा दरबार एकमत हो गया कि कोई भी व्यक्ति किसी को एक बार ही मूर्ख बना सकता
है। स्वयं महाराज ने यह बात निष्कर्ष के रूप में कही। मगर तेनाली राम तब भी शान्त
रहा। शेष सभासद महाराज की हाँ में हाँ मिलाते रहे। जब महाराज ने देखा कि इस चर्चा
के निष्कर्ष तक पहुँचने के बाद भी तेनाली राम शान्त है तब उन्होंने पूछा, "क्या बात है
तेनाली राम! तुम चुप क्यों हो? क्या तुम नहीं मानते कि कोई भी किसी को एक बार ही
मूर्ख बना सकता है?"
तेनाली राम कुछ बोलता, उससे पहले ही सारे सभासद हँस पड़े और उनमें से एक ने
कटाक्ष किया, "महाराज, तेनाली राम विद्वान हैं और वे हम सबको एक बार में मूर्ख बना
सकते हैं, ऐसे में वे हमारी बात से सहमत क्यों होंगे?"
महाराज हँसते हुए पूछ बैठे, "क्या सचमुच ऐसा है तेनाली राम? तुम एक बार में हम
सबको मूर्ख बना सकते हो?"
तेनाली राम ने विनम्रतापूर्वक कहा, "महाराज! मैं ऐसा कोई दावा कैसे कर सकता हूँ?
आप अन्नदाता हैं। आप स्वामी हैं और मैं सेवक हूँ। हाँ, इतना अवश्य है कि अभी जो कुछ
कहा गया है, उससे मैं सहमत नहीं हूँ।"