तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in contextअष्टम अनुवाक
अन्नका त्याग न करना Schneider/व्रत तथा जल और ज्योतिरूप
अन्न-ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन
अन्नं न परिचक्षीत। तद्व्रतम्। आपो वा अन्नम्।
ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः
प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्न-
मन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति।
महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान्कीर्त्या ॥१॥
अन्नका त्याग न करे। यह व्रत है। जल ही अन्न है। ज्योति
अन्नाद है। जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है और ज्योतिमें जल स्थित है।
इस प्रकार ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको
अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद
होता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥
अन्नं न परिचक्षीत न परि- | अन्नका प्रत्याख्यान अर्थात् त्याग
| न करे, यह व्रत है—यह कथन
हरेत्। तद्व्रतं पूर्ववत्स्तुत्यर्थम्। | पूर्ववत् स्तुतिके लिये है। इस
| प्रकार शुभाशुभकी कल्पनासे उपेक्षा
तदेवं शुभाशुभकल्पनया अपरि- | न किया हुआ अन्न ही यहाँ स्तुत
हियमाणं स्तुतं महीकृतमन्नं स्यात्। | एवं महिमान्वित किया जाता है।
एवं यथोक्तमुत्तरेष्वप्यापो वा | तथा आगेके 'आपो वा अन्नम्'
| इत्यादि वाक्योंमें भी पूर्वोक्त अर्थकी
अन्नमित्यादिषु योजयेत् ॥१॥ | ही योजना करनी चाहिये ॥१॥
इति भृगुवल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥
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