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स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

by श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर)

Source: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (origin)

Devanagarihipublished94 pages
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स्वरोदय-विज्ञान

...

स्वरोदय

स्वर+उदय=स्वरोदय। स्वर के नियमपूर्वक चलाने की विद्या को स्वरोदय कहते हैं। यह अत्यन्त प्राचीन और प्रतिष्ठित विज्ञान है। संसार की विद्याओं का यह केन्द्र है। जिन प्रश्नों का बड़े-बड़े तत्त्वज्ञ और भिन्न-भिन्न धर्म यथोचित उत्तर नहीं दे सकते उनका यह शीघ्र ही समाधान कर सकता है। हिन्दू शास्त्र के अनुसार संसार पांच तत्वों से बना है, अर्थात् मूल तत्व पांच तत्वों में बँटने के पश्चात् सृष्टि की उत्पत्ति का कारण हुआ है। इनसे ही पांच तत्वों का भली-भांति ज्ञान होने से मनुष्य सृष्टि के रहस्य को समझ सकता है। श्री महादेव जी ने इस विद्या का वर्णन पार्वती से किया। जिस प्रकार हिन्दू शास्त्र के अन्तर्गत अनेक मतमतान्तरों एवं भिन्न-भिन्न विद्याओं के कर्ता महादेव जी माने गये हैं, उसी प्रकार स्वरोदय शास्त्र का प्रथम ज्ञान भी शिव-पार्वती सम्वाद के नाम से शिव-स्वरोदय में वर्णित है।

३०० वर्ष पूर्व इसके प्रख्यात ज्ञाता श्री चरणदासजी ने हिन्दी भाषा में इसको कविता का रूप प्रदान किया। कहते हैं कि श्री व्यास पुत्र शुक्रदेवजी ने स्वयं चरणदासजी को इसका ज्ञान कराया था।

इस समय यह विद्या लुप्त हो रही है। लोगों का विश्वास इससे हट रहा है। परन्तु तब भी जो लोग इससे जरा भी परिचित है। वे इसके रहस्य को खूब जानते हैं। उनकी श्रद्धा को किसी प्रकार का तर्क खण्डित नहीं कर सकता। चरणदास जी का कथन है :-

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(२)

(स्वरोदय विज्ञान)

सब योगन को योग है, सब ज्ञानन को ज्ञान।

सर्व सिद्धि की सिद्धि हैं, तत्त्व सुरन कौ ध्यान।।

इस विद्या को जानने वाले तीनों काल का हाल बता सकते हैं, जो इस विद्या से खूब परिचित हैं वे अपनी मृत्यु अथवा बीमारी का हाल पहले ही मालूम कर लेते हैं। इसके अनुसार जो कार्य किया जाता है वह कभी विफल नहीं होता :-

धरनि टरै गिरिवर टरै, टरै जगत सुन भीत।

वचन स्वरोदय ना टरै, कह मुरली सुत रणजीत।

स्वरों का वर्णन

स्वर तीन हैं— दाहिना (पिङ्गल स्वर), बायां (इडा स्वर) और सुषुम्णा। इडा, पिङ्गला, सुषुम्णा—तीन नाडियों और इन्हीं के नाम से तीन प्रकार के स्वर प्रसिद्ध हैं। इडा शरीर के बायीं और फँली हुई है इसे चन्द्र—नाडी कहते हैं। पिङ्गला शरीर के दाई ओर है, इसे सूर्य नाडी कहते हैं, सुषुम्णा नाडी शरीर के बीचों—बीच है। सूर्य—चक्र इसी के आधार पर स्थित है।

श्वास कभी दाहिनी नथने से ज्यादा जोर से निकलता है, कभी बायें से, कभी दोनों नासिकाओं में बराबर निकलता है। यदि स्वर बायीं नासिका से ज्यादा आवे तो उसे इडा स्वर या चन्द्र स्वर कहते हैं। यदि श्वास दाहिनी नासिका से अधिक आवे तो उसे पिङ्गला या सूर्य स्वर कहते हैं। यदि श्वास दोनों नासिकाओं से बराबर निकलता है तो उसे सुषुम्णा स्वर कहते हैं।

इडा पिङ्गला सुषुम्णा—नाडी तीन विचार।

दाहिने बायें स्वर चले—लखें धारना धार।

इस विद्या में चन्द्रमा को अधिष्ठात्री माना गया है। सब प्रकार की

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(स्वरोदय विज्ञान)

(३)

गणना यहीं से की जाती। शुक्ल पक्ष से सब कार्यारम्भ होता है।

शुक्ल पक्ष के आदि ही, तीन तिथि लग चन्द्र।

फिर सूरज फिर चन्द्र है, फिर सूरज फिर चन्द्र।

कृष्ण पक्ष के आदि में, तीन तिथि लग भान।

फिर चन्द्र फिर भान है, फिर चन्द्र फिर भान।।

शुक्ल पक्ष अर्थात् चाँदनी रात की पहली तिथि को निरोगी मनुष्य का सूर्योदय के समय चन्द्र स्वर चलता रहेगा। इसी प्रकार लगातार तीन दिन तक ऐसा रहेगा। यह दशा पाँच घड़ी तक रहती है। बाद में स्वर बदल जाता है।

कृष्ण पक्ष में लगातार तीन दिन तक अर्थात् प्रथमा, द्वितीया और तृतीया की सूर्योदय के समय सूर्य स्वर चलेगा। तीन दिन के बाद सवेरे स्वर बदल जाया करता है। नीचे के नक्शे से यह बात भलीभाँति समझ में आ जावेगी।

प्रातः काल का समय सूर्योदय से लेकर ५ घड़ी तक -

दाहिना (सूर्य)

बाँया (चन्द्र)

कृष्ण पक्ष -

१, २, ३, ७, ८, ९

१३, १४, १५

४, ५, ६, १०, ११, १२

शुक्ल पक्ष -

४, ५, ६, १०, ११, १२

१, २, ३, ७, ८, ९

१३, १४, १५

पाँच घड़ी समाप्त होने पर स्वर आप से आप बदल जाता है। यह दशा

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(४)

(स्वरोदय विज्ञान)

केवल स्वस्थ मनुष्यों की होती है। यदि शरीर में कुछ गड़बड़ है तो निःसंदेह स्वर में कुछ फर्क पड़ जावेगा। यदि पक्ष के आरम्भ में लगातार तीन दिन तक स्वर उल्टा चले तो प्रायः १५ रोज तक शरीर में एक न एक नयी व्याधि सताया करती है। यदि कोई मनुष्य केवल स्वर ठीक कर सके तो कम से कम बहुत बीमार न रहेगा और यदि बीमारी रहेगी तो बहुत ज्यादा जोर न करेगी।

पंच-तत्वों का वर्णन

आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल—ये पाँच तत्व हैं। हर एक नासिका—नथने से एक स्वर पाँच घड़ी तक चलता है, फिर दूसरी नासिका—नथने से चलने लगता है। जब स्वर चलता है, तो उसमें तत्व भी एक—एक घड़ी के हिसाब से चलते हैं, सबसे पहिली घड़ी में वायु तत्व चलता है, फिर क्रमानुसार अग्नि, पृथ्वी और जल तत्व चला करते हैं। वायु तत्व इस प्रकार नहीं चलता। वह हर एक तत्व के साथ थोड़ी—थोड़ी देर चलकर अपनी एक घड़ी पाँच घड़ी में से ले लेता है, इस तरह कुल २४ घण्टों में अर्थात् ६० घड़ी में पाँच तत्व १२ बार बदलते हैं। यह तो हुई दशा अलग अलग तत्वों की, इन पाँचों तत्वों के मेल से हर एक के पाँच भाग हो जाते हैं। उदाहरण के लिए वायु तत्व कीजिये :-

प्रथम — वायु में वायु

द्वितीय — वायु में अग्नि

तीसरे — वायु में पृथ्वी

पाँचवें — वायु में आकाश

यह बात गणित से भली भाँति मालूम हो सकती है परन्तु स्वरोदय के अभ्यासी को गणित करने की कोई आवश्यकता नहीं है: क्योंकि प्रत्येक तत्व

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(स्वरोदय विज्ञान)

(५)

का रंग उसको हर वक्त दीखता रहता है। प्रत्येक तत्व के रंग, स्वाद, रूप चाल आदि का नक्शा नीचे दिया जाता है :-

नाम तत्वरंगस्वादस्वरूपस्वभावचाल
आकाशकालाकडुवाकान के सामानशीतल१ अंगुल
अन्दरहीअं
वायुहराखट्टागोलचञ्चल९ तिरछी
अग्निलालचर्परात्रिकोणगरम४ ऊपर...
पृथ्वीपीलामीठाचौकोरभारी१३ समुख
जलसफेदमीठा से
जरा कमचन्द्राकारशीतल१६ नीचे

स्वर-ज्ञान की रीति

स्वर पहचानने की साधारण रीति तो यह है कि साधक शान्तीरिति से बैठकर श्वास कहीं तक नीचे जाता है उसे नाप ले। साधारणतः तत्व मालूम हो ही जावेगा। यदि नासिका के अन्दर ही अन्दर श्वास रहे, तो आकाश तत्व जाने। ४ अंगुल बाहर आवे तो अग्नि तत्व—८ अंगुल बाहर आवे तो वायु तत्व, १२ चंगुल बाहर आवे तो पृथ्वी तत्व, १६ अंगुल बाहर आवे, तो जल तत्व समझना चाहिए।

इसकी एक दूसरी विधि भी है। एक आइना या दर्पण को साफ करके उस पर जोर से श्वास मारो ताकि दर्पण श्वास की भाप से धुंधला हो जाये, फिर देखो कि इस धुंधलेपन का क्या स्वरूप होता है।

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(६)

(स्वरोदय विज्ञान)

यदि चार कोने बराबर हैं, तो पृथ्वी तत्व जानो, अर्द्ध चन्द्राकार है तो जलतत्व। यदि आकृति गोल हो तो वायु तत्व चलना जानो। यदि आकृति त्रिकोण है, तो अग्नि तत्व चलता जानो और यदि आकृति कान (कर्ण) की हो, तो आकाश तत्व चलता जानो।

पृथ्वी तत्व

(पीला रंग)

जल तत्व

(सफेद रंग)

वायु तत्व

(हरा रंग)

अग्नि तत्व

(लाल रंग)

आकाश तत्व

(काला रंग)

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(स्वरोदय विज्ञान)

(७)

तत्त्व पहचानने की एक सरल विधि और भी है। पाँच गोली पाँच तत्त्वों के रंग की बनवाले। सदा उनको अपने जेब में रखें। जब कभी आपकी इच्छा यह जानने की हो कि कौन सा तत्त्व चल रहा है तो आंखें बन्द करके और मन को एकाग्र करके जेब में से एक गोली निकाल लें। बहुधा उसी रंग की गोली निकलेगी, जिस रंग का तत्त्व उस समय चल रहा होगा। यदि नेत्र बन्द कर लिये जावें तो अंधेरे में जो रंग दिखाई देता है – उसका ध्यान पूर्वक देखने से भी तत्त्व को पहचान हो सकती है। परीक्षा के लिये अपने किसी मित्र से कहे कि, कोई रंग वह अपने मन में ले ले। अब तुम यह पता लगाओ कि तुम्हारा कौन सा तत्त्व चल रहा है। जो तत्त्व चल रहा होगा वही रंग उसने अपने मन में लिया होगा। पहले पहल गलती अवश्य होगी, परन्तु अभ्यास से ठीक रंग का पता लग जावेगा। अभ्यास से यह बतलाना, कि अमुक मनुष्य ने आज क्या खाया है, मामूली बात हो जाती है।

स्वरों के स्वामी, दिन, और राशियां

स्वरों का सम्बन्ध राशि, नक्षत्र और दिन, तीनों से है। प्रश्न पूछने के समय वह बहुत काम आता है। इडा स्वर का स्वामी चन्द्रमा है – यह स्थिर है। पिङ्गला स्वर का स्वामी सूर्य है – यह चर है। सुषुम्णा चर और स्थिर दोनों स्वभाव अपने में रखता है। इडा, शीतल, पिङ्गला गर्म और सुषुम्णा सम-शीतल है। इडा का स्वामी, कई हिन्दू ग्रंथकारों ने ब्रह्मा, पिंगला का शिव और सुषुम्णा का विष्णु लिखा है। सोमवार बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार चन्द्र स्वर के दिन हैं। शनि, रवि, मंगल, – ये सूर्य स्वर के दिन हैं।

मंगल अरु इतवार दिन और शनिश्चर लीन।

शुभकारज को मिलते हैं सूरज के दिन तीन।

सोमवार शुक्कर भलौ, दिन बृहस्पति को देख।

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(८)

(स्वरोदय विज्ञान)

चन्द्र योग में सफल हैं, चरणदास कह शेष ॥

इडा स्वर या चन्द्र स्वर की दिशाएं हैं— दक्षिण और पश्चिम। पिंगला स्वर या सूर्य स्वर की दिशाएं हैं — पूर्व और उत्तर। इडा स्वर की लग्न हैं — वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ। पिंगला स्वर की मेष, कर्क, तुला, मकर और सुषुम्णा स्वर की मिथुन, कन्या, धनु और मीन हैं :-

सूर्य स्वरमेषकर्कतुलामकर
चन्द्र स्वरवृषसिंहवृश्चिककुम्भ
सुषुम्णा स्वरमिथुनकन्याधनुमीन

कर्क मेष, तुला, मकर चारों चरती राश।

सूरज सौ चारों मिलत, चर कारज प्रकाश ॥

मीन, मिथुन, कन्या, कहीं, चौथी औ धन मीन।

द्विस्वभाव का सुषुम्णा, मुरली सुत रणजीत।

वृश्चिक, सिंह, वृष, कुम्भ, युत बायें स्वर के संग।

चन्द्र योग को मिलत हैं, थिर कारज परसंग ॥

नक्षत्र

इडा स्वर के नक्षत्र ये हैं :-

अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा मूल और पूर्वाषाढ़।

पिंगला स्वर के नक्षत्र ये हैं -

अश्विनी, भरणी, कृतिका, उत्तरषाढ़ अभिजित, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद रेवती और रोहिणी।

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(स्वरोदय विज्ञान)

(६)

सुषुम्णा स्वर के नक्षत्र ये हैं :-
मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु और पुष्य।

उत्तर-पश्चिम-तालिका

नाम स्वरपिंगलाइडासुषुम्णा
प्रसिद्ध नामसूर्यचन्द्रदोनों
स्वभावचरस्थिरद्वि स्वभाव
प्रभावगर्मशीतलद्वि स्वभाव
देवताशिवब्रह्माविष्णु
पक्षकृष्णशुक्ल
दिनशनि रवि मंगलबु, वृ, शु, सोम
दिशापूर्व-उत्तरदक्षिण, पश्चिम
तत्वअग्नि वायुजल, पृथ्वी, आकाश
शरीर के अनुसार
दिशानीचे, पीछे, दाहिनेऊपर, बायें, सामने
मेष कर्कवृष, सिंहमिथुन, कन्या
लग्नतुला मकरवृश्चिक कुम्भमीन, धनु
उ.फा, हस्त चित्रामृगशिरा
नक्षत्रउत्तराषाढ़ अभिजित्स्वाती, विशाखाआर्द्रा
श्रवण, घनिष्ठाज्येष्ठा, मूल,पुनर्वसु, पुष्य
शतभिषा पूर्वाभाद्रपदपूर्वाषाढ़, अनुराधा
संख्या१,३,५,७,८,९,११,
इत्यादि२,४,६,८,१०,१२
इत्यादि
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(१०)

(स्वरोदय विज्ञान)

स्वरों में अच्छे काम करने का वर्णन

चन्द्र-स्वर

चन्द्र-स्वर में वे काम करना चाहिए जो स्थायी हों और जिनमें कुछ परिश्रम और प्रबन्ध की आवश्यकता हो। जैसे—मकान बनाना, बाग लगाना, कुआँ खुदवाना, तालाब बनवाना, दूर देशों की यात्रा करना, नये आश्रम में प्रवेश करना, मकान बदलना, विवाह करना, आभूषण पहनना, सामान इकट्ठा करना, दान देना, औषधि खाना, हाकिम से मिलने जाना, व्यापार करना, मित्रों से मिलना, सवारी—हाथी घोड़े मोल लेना, दूसरों की भलाई करना, गाना, नाचना, बाजा बजाना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर रहने जाना, पानी पीना, पेशाब करना, धन एकत्र करना, बीज बोना, विद्यारम्भ करना, घर की नींव रखना, गांव खरीदना, दुकान खोलना, किसी की सिफारिश करना, किसी देश पर अधिकार करना, दक्षिण या पश्चिम की यात्रा करना, प्रेम करना, प्रार्थना करना, राज पर बैठना और नौकरी पर पहले दिन जाना इत्यादि।

साथ ही तत्व का ख्याल भी रहे। यदि चन्द्र स्वर में जल या पृथ्वी तत्व चलता हो तो काम उसी क्षण पूरा होगा।

सूर्य-स्वर

सूर्य स्वर में इनसे भी कठिन कार्यारम्भ करने चाहिये। जैसे कठिन विषयों का पढ़ना, जहाज आदि पर बैठना, शिकार खेलना, ऊंचे मकान या सवारी पर चढ़ना, लिखना, लेन—देन करना, कुशती लड़ना, सोना, जुआ खेलना, समुद्र यात्रा करना, नहाना, भोजन करना, शौचादि को जाना, युद्ध करना, शस्त्र विद्या सीखना, बीमार का इलाज करना, स्वरोदय का साधन करना, शत्रु पर चढ़ाई करना या उसके घर जाना, किसी स्थान को गिरा देना, पूर्व और उत्तर की यात्रा करना, कर्जा देना या लेना इत्यादि इत्यादि।

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(स्वरोदय विज्ञान)

(११)

सुषुम्ना स्वर

सुषुम्ना-स्वर के चलते समय कोई संसारी कार्य नहीं करना चाहिए। यदि कोई कार्य किया जावे तो वह कभी भी ठीक न होगा। इस समय हरिकीर्तन, योगाभ्यास, सोहं का जप आदि करना चाहिए। इस समय का किया हुआ योग साधन बहुत अधिक प्रभाव रखता है। इसका मुख्य कारण यह है कि सुषुम्ना स्वर के चलते समय शरीर की सब नाडियाँ और सब चक्र कुछ विकसित हो जाते हैं। सूर्य चक्र की ग्रन्थि भी अभ्यास से दिखने लगती है।

इसी प्रकार यह भी ध्यान रहे कि तत्व का प्रभाव स्वर से अधिक पड़ता है। पृथ्वी तत्व में वे काम करने चाहिए जो कि परिश्रम और दृढ़ता चाहते हैं। जल तत्व में जल्दी के काम करने चाहिए। अग्नि तत्व में अत्यन्त किलष्ट और मेहनत के काम करने चाहिए। वायु तत्व और आकाश तत्व के काम प्रायः निष्फल होते हैं। वायु तत्व में शत्रु को हानि पहुंचा सकते हैं और आकाश तत्व में योग साधन कर सकते हैं।

स्वरों का नियमित पालन

स्वरों के नियमित पालन से शारीरिक और मानसिक दोनों उन्नति हो सकती है। प्रातःकाल उठकर यह देखें कि, आज कौन दिन है? पक्ष कौन सा है? तिथि कौन सी ही? कृष्ण पक्ष में तीन तिथियों तक दाहिना स्वर प्रातःकाल पाँच घड़ी तक चलता है, बाद में बायाँ हो जाता है। यदि दिन, तिथि और पक्ष समान हो तो दिन अच्छी तरह से बीतेगा। कोई भी दुर्घटना नहीं होगी। तीन दिन तक लगातार नियमपूर्वक स्वर और तत्वों के चलने से पक्ष बहुत अच्छा बीतता है।

इस शास्त्र के आचार्यों ने अपने अनुभव से बतलाया है कि यदि सूर्य के स्थान में चन्द्रमा की चाल हो तो पहले दो घण्टों में चिन्ता और शोकयुक्त घटना होवे; दूसरे दो घण्टों में धन की हानि तीसरे में यात्रा, चौथे में हानि

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(१२)

(स्वरोदय विज्ञान)

पांचवे में पदच्युत होना, छठवें में रञ्ज, सातवें में बीमारी से कष्ट, आठवें में पीड़ा या मृत्यु। यदि प्रातःकाल सूर्य स्वर चले तो निराशा से आशा का प्रादुर्भाव होवे। इसके विपरीत निराशा व कष्ट हो। यदि किसी प्रकार का दुःख या सन्ताप हृदय को पीड़ा दे रहा हो तो चन्द्र स्वर चलावे। इससे प्रशंसा हो जावेगी।

दिन को तो चन्दा चले, चले रात को सूर।
यह निश्चय कर जानिए, प्राण गमन है दूर॥

अर्थात्—दिन को चन्द्र स्वर चलावे और रात को सूर्य-स्वर जो ऐसा साधन करता है, उसकी असामयिक मृत्यु नहीं होती। केवल भोजन करते समय बराबर आधे घण्टे तक सूर्य स्वर चलावे और रात्रि को पानी पीते वक्त पन्द्रह मिनट तक चन्द्र स्वर रखे।

सूक्ष्म भोजन कीजिये, रहिये या पड़ सोय।
जल थोड़ा सा पीजिये, बहुत बोल मत खोय।

भोजन के उपरान्त पहले आठ श्वास सीधे अर्थात् चित्त लैटकरर लें, पुनः १६ श्वास दाहिने करवट होकर लें, पुनः ३२ श्वास बायें करवट होकर लें। इस तरह करने से बहुत सी बीमारियां भाग जाती हैं।

यदि किसी मनुष्य ने जहर खा लिया है, तो चाहिए कि चन्द्र स्वर और जल तत्त्व शीघ्र ही चला दे। जहर का कुछ भी असर न हो सकेगा। यदि पृथ्वी और जल तत्त्व अधिक चलें तो द्रव्य मिले और स्वास्थ्य अच्छा रहें। यदि वायु तत्त्व चले तो विपत्ति, ज़रबारी, अग्नि से मृत्यु और आकाश से हानि होती है।

यदि चन्द्रमा स्वर हो और पृथ्वी या जल तत्त्व अधिक चले तो स्वास्थ्य अच्छा रहे और द्रव्य की प्राप्ति हो। यदि बहुत से लोग एकत्र बैठे हों और वायु तत्त्व एकाएकी चलने लगे तो समझ लो कि कोई मनुष्य जाना चाहता है। कह दो, जो जाना चाहता है, वह सहर्ष जा सकता है।

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(स्वरोदय विज्ञान)

(१३)

स्वर वर्णन

नाम नाडी
व
प्रकृति | नाम नाडी जिसमें स्वर
बहता है व प्रकृति व
पक्ष जिस नाडी का है | नाम दिन जो
स्वरसे संबंध
रखते हों | स्वर चलाने
का समय | दिशाएं
प्रश्नादिक
के लिए
---|---|---|---|---
इडा

(स्थिर
कार्य) | इडा व चन्द्रमा बाएँ स्वर
का नाम है। प्रकृति
शीतल है शुक्ल पक्ष में
१५ दिन इसकी प्रधानता
है। सदा घण्टे तक एक
एक नाडी का प्रमाण है
क्रम से इसमें पांचों तत्व
बहते हैं। | बुधवार

बृहस्पतिवार

शुक्रवार
सोमवार | दिन को

चलाने से

आयु बढ़े | बायें

ऊपर

सामने
पिङ्गला

(चर
कार्य) | पिगला व सूर्य दाहिने
स्वर का नाम है। कृष्ण
पक्ष में १५ दिन इसकी
प्रधानता है। | रविवार

शनिवार
मंगलवार | दिन को
चलाने से
आयु घंटे
शक्ति को
चलाना
उचित है। | दाहिने

नीचे
पीछे

सुषुम्णा
द्विस्वभाव

योगाभ्यास, हरिकीर्तन, जप, परोपकार

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(१४)

(स्वरोदय विज्ञान)

नक्शा - १

लग्न या राशि | यात्रा की दिशाएं
स्वरानुसार | कालज्ञान | शुभ कार्यों का वर्णन जो स्वर्गों में किये जाते हैं
---|---|---|---
वृष, कर्क
कन्या | पश्चिम
दक्षिण | चार, आठ, बारह
या बीस दिन चले
तो योगी की आयु
बढ़ें | ब्याह करना, दान देना,
तीर्थ करना वस्त्र या
भूषण बनवाना या पहनना,
घर जाना,
वृश्चिक
मकर | | | पुस्तक लेना, योगाभ्यास करना,
प्रीति करना, औषधि देना, पानी
मीन | | | पीना, दीक्षा मन्त्र लेना-देना,
बाग या गुफा बनवाना,
अन्न बोना इत्यादि
मेघ, सिंह | पूर्व | ८ पहर १६ पहर २ दिन
३ वर्ष २ वर्ष १ वर्ष | शुद्ध करना, भोजन करना,
स्नान करना, मैथुन करना,
तुला, कुंभ | उत्तर | १६ दिन चले १ मास | विवाह करना, हाथी, घोड़ा
मिथुन
धन | | १ मास २ दिन | या हथियार लेना, विद्या
पढ़ना, मंत्र जपना, ध्यान
करना, कर्ज, देना-लेना।

के काम करना

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(स्वरोदय विज्ञान)

(१५)

तत्त्व वर्णन

नाम
तत्त्व | रंग | चाल | तत्त्व का
स्वाद | प्रकृति | स्थान
---|---|---|---|---|---
आकाश | काला | दोनों नासिकाओं
के भीतर | बुरा
फीका | स्थिर | सिर में
अग्नि | लाल | ४ अंगुल नासिका
के बाहर आवे
ऊपर होकर | चरपरा | तप्त | पित्त
वायु | हरा | ८ अंगुल तिरछा
चले | खट्टा | चर | नाभि में
पृथ्वी | पीला | १२ अंगुल नासिका
से बाहर | मीठा | कठिन | नाभि के
ऊपर
जल | श्वेत | १६ अंगुल | कम
मीठा | शीतल | मगज

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(१६)

(स्वरोदय विज्ञान)

नक्शा -२

द्वारकार्यएक एक तत्त्व के पञ्च किरण का परिणाम जिससे शरीर में क्रियाएं होती हैं।टीका
कानशब्दकाम, क्रोध, लोभ, मोह मत्सरस्वरोदय शास्त्र के अनुसार सब कृत्व तत्वों के अनुसार होते हैं और आत्मा का निर्लैप होता है।
नेत्रदेखनाभूख, प्यास, नींद, आलस, जम्हाई
दोनों नासिकासूंधनादौड़ना, उछलना, हिलना, बढ़ना आदि
मुखभोजन करनामांस, चर्म, हड्डी-नाड़ी रोम आदि
लिङ्गमैथुन कार्यखून, मूत्र, कफ, पसीना
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(स्वरोदय विज्ञान)

(१७)

अन्तःकरण की चार प्रवृत्तियाँ (नक्शा-३)

नाममनचित्तबुद्धिअहंकार
देवताचन्द्रमाविष्णुब्रह्मारुद्र
कार्यसंकल्पचित्तमाननिश्चयममता
विकल्पकरना'मैं तू' का
सम्बन्ध

पञ्च ज्ञानेन्द्रिय (नक्शा-४)

श्रवणत्वचानेत्ररसनानासिका
दिकपालपवनसूर्यवर्णअश्विनी
कुमार
शब्दस्पर्शरूपरसगंध
आकाशपवनअग्निजलपृथ्वी

पञ्च कर्मेन्द्रिय (नक्शा -५)

वाक्यहस्तपादलिङ्गगुदा
अग्निइन्द्रउपेन्द्रप्रजापतियम
बोलनालेना-देनाचलनारतिभोगमल त्याग
आकाशपवनअग्निजलपृथ्वी
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(१८)

(स्वरोदय विज्ञान)

स्वरोदय शास्त्र और आरोग्यता

इस विद्या का अभ्यासी बहुत ही स्वस्थ रह सकता है। वह दूसरों की बीमारी भी दूर कर सकता है। तत्त्व और स्वर इनके विपरीत चलने से ही बीमारी होती है। और बीमारी होने से ये विपरीत चलने लगते हैं। यदि तत्त्व और स्वर समय पर चलें तो कोई बीमारी नहीं हो सकती। यदि जरा भी भेद मालूम हो, तो जान लो कि बीमारी का प्रवेश हो गया है। उसी समय स्वर को ठीक करने का प्रयत्न करो इससे एकदम तो बीमारी नष्ट न हो जावेगी परन्तु कम अवश्य होगी। साधारण बीमारी तो इसी से दूर हो जावेगी। यदि स्वर और तत्त्व ठीक चल रहे हों, तो उनको कभी भी नहीं बदलना चाहिए। स्वरों में चन्द्र स्वर और तत्त्वों में जल और पृथ्वी स्वास्थ्य के लिये बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुए हैं। आकाश तत्त्व मृत्युकारी है। अग्नि और वायु का भी जहाँ प्रवाह अधिक होगा,, वहाँ बीमारी अधिक होगी।

सूर्यस्वर गर्म और चन्द्रस्वर ठण्डा है। इसलिये यदि कोई बीमारी शनि के कारण है, तो इसके लिये सूर्यस्वर लाभदायक है। इसी प्रकार गर्मी के कारण जो जो बीमारियाँ होती हैं, उनके लिये चन्द्रस्वर लाभदायक है। साथ साथ तत्त्वों का भी ध्यान रक्खा जावे।

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(स्वरोदय विज्ञान)

(१६)

स्वर बदलने की विधि

पहली विधि -

जो स्वर चलाना चाहो, उसके विपरीत करवट बदल कर लेट जाओ। थोड़ी देर में स्वर बदल जावेगा। उदाहरणार्थ यदि सूर्य स्वर चल रहा है और चन्द्र चलाना है तो दाहिना करवट लेट जाओ।

दूसरी विधि -

पुरानी रुई की बत्ती बनाकर नासिका में लगा दो। जो स्वर चलाना हो, उसे ही खुला रखो।

तीसरी विधि -

लेट कर तीसरी पसली के पास तकिया दवा दो। बहुत शीघ्र स्वर बदल जाता है।

चौथी विधि-

एकाएक दौड़ने से या परिश्रम या कसरत करने से भी स्वर बदल जाता है। बीमार को भी इसी नियम का पाबन्द बनावे। बहुत शीघ्र औषधि का सुपरिणाम मालूम होगा और बीमारी भाग जावेगी।

गर्भाधान विधि

इस विषय में विद्या का अभ्यासी अपने और दूसरों के लिए बहुत कुछ कर सकता है। हजारों मनुष्य चाहते हैं कि वे सन्तान का मुख देख सकें। हजारों पूजा-पाठ बैठते हैं। कोई-कोई तो इसी धुन में अपनी प्रतिष्ठा भी खो देते हैं और धन भी गंवाते हैं; परन्तु उनको आशातीत सफलता नहीं होती; किन्तु इसका अभ्यासी इस विषय में बहुत कुछ कर सकता है।

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(२०)

(स्वरोदय विज्ञान)

स्त्री सम्भोग केवल रात्रि के समय जबकि भोजन अच्छी तरह से पच जावे—होना चाहिए। दोनों हर तरह से प्रसन्नचित्त हों। दूसरे किसी समय में, स्त्री का संसर्ग ही नहीं होना चाहिए। प्रातःकाल के संभोग से शक्ति व्यर्थ ही नष्ट होती है। संभोग के समय पुरुष का स्वर सदा सूर्य चलना चाहिए। चन्द्रस्वर में गर्भ रहना असम्भव है। सूर्यस्वर के साथ तत्त्व का भी ख्याल रहे।

जल पृथ्वी के योग में, गर्भ रहे सो पूत।
वायु तत्त्व में छोकड़ी, और सूत के सूत।।
पृथ्वी तत्त्व में गर्भ जो, बालक होवे भूप।
धन्वन्ता सोइ जानिये, सुन्दर होय स्वरूप।।

जल और पृथ्वी तत्त्व में यदि गर्भ रह जावे, तो लड़का होता है — वह भाग्यवान् तथा सदाचारी होता है। यदि वायु तत्त्व में स्वर चले तो लड़की होती है। आकाश तत्त्व में गर्भ रहते ही यदि लड़का पैदा होवे, तो उसकी माता की मृत्यु हो जावे। इस तत्त्व में एक तो गर्भ ही बहुत कम रह सकता है। अग्नि तत्त्व में गर्भ रहता नहीं, यदि रहा तो गर्भपात का और स्त्री के मरने का भय रहता है। सूर्यस्वर में लड़का और चन्द्रस्वर में लड़की पैदा होती है। गर्भ उसी समय रहता है, जबकि स्त्री का चन्द्रस्वर चलता हो और मर्द का दाहिना सूर्य स्वर। यह सबसे अच्छा समय है। तत्त्व साथ में पृथ्वी या जल होवे। यदि स्त्री बाँझ है या और कोई खराबी है, तो लिखा है कि यदि पुरुष अपना दाहिना स्वर करे और स्त्री का बाँया और दोनों का तत्त्व जल हो, तो बाँझ को भी गर्भ रह सकता है।

स्वर इच्छानुसार बदल सकता है। तत्त्व इच्छा और धारणा शक्ति से बदल सकता है। अभ्यासी के लिए, जिसने स्वर को और तत्त्वों को वशीभूत किया है, यह अति साधारण बात है। वह अपने और दूसरे के ऊपर जो चाहे स्वर और तत्त्व बदल सकता है। ज्यों ही तत्त्व का ध्यान किया कि वह बदल जाता है।