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स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

by श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर)

Source: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (origin)

Devanagarihipublished94 pages

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(स्वरोदय विज्ञान)

पांचवे में पदच्युत होना, छठवें में रञ्ज, सातवें में बीमारी से कष्ट, आठवें में पीड़ा या मृत्यु। यदि प्रातःकाल सूर्य स्वर चले तो निराशा से आशा का प्रादुर्भाव होवे। इसके विपरीत निराशा व कष्ट हो। यदि किसी प्रकार का दुःख या सन्ताप हृदय को पीड़ा दे रहा हो तो चन्द्र स्वर चलावे। इससे प्रशंसा हो जावेगी।

दिन को तो चन्दा चले, चले रात को सूर।
यह निश्चय कर जानिए, प्राण गमन है दूर॥

अर्थात्—दिन को चन्द्र स्वर चलावे और रात को सूर्य-स्वर जो ऐसा साधन करता है, उसकी असामयिक मृत्यु नहीं होती। केवल भोजन करते समय बराबर आधे घण्टे तक सूर्य स्वर चलावे और रात्रि को पानी पीते वक्त पन्द्रह मिनट तक चन्द्र स्वर रखे।

सूक्ष्म भोजन कीजिये, रहिये या पड़ सोय।
जल थोड़ा सा पीजिये, बहुत बोल मत खोय।

भोजन के उपरान्त पहले आठ श्वास सीधे अर्थात् चित्त लैटकरर लें, पुनः १६ श्वास दाहिने करवट होकर लें, पुनः ३२ श्वास बायें करवट होकर लें। इस तरह करने से बहुत सी बीमारियां भाग जाती हैं।

यदि किसी मनुष्य ने जहर खा लिया है, तो चाहिए कि चन्द्र स्वर और जल तत्त्व शीघ्र ही चला दे। जहर का कुछ भी असर न हो सकेगा। यदि पृथ्वी और जल तत्त्व अधिक चलें तो द्रव्य मिले और स्वास्थ्य अच्छा रहें। यदि वायु तत्त्व चले तो विपत्ति, ज़रबारी, अग्नि से मृत्यु और आकाश से हानि होती है।

यदि चन्द्रमा स्वर हो और पृथ्वी या जल तत्त्व अधिक चले तो स्वास्थ्य अच्छा रहे और द्रव्य की प्राप्ति हो। यदि बहुत से लोग एकत्र बैठे हों और वायु तत्त्व एकाएकी चलने लगे तो समझ लो कि कोई मनुष्य जाना चाहता है। कह दो, जो जाना चाहता है, वह सहर्ष जा सकता है।