स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
by श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर)
Source: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (origin)
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सुषुम्ना स्वर
सुषुम्ना-स्वर के चलते समय कोई संसारी कार्य नहीं करना चाहिए। यदि कोई कार्य किया जावे तो वह कभी भी ठीक न होगा। इस समय हरिकीर्तन, योगाभ्यास, सोहं का जप आदि करना चाहिए। इस समय का किया हुआ योग साधन बहुत अधिक प्रभाव रखता है। इसका मुख्य कारण यह है कि सुषुम्ना स्वर के चलते समय शरीर की सब नाडियाँ और सब चक्र कुछ विकसित हो जाते हैं। सूर्य चक्र की ग्रन्थि भी अभ्यास से दिखने लगती है।
इसी प्रकार यह भी ध्यान रहे कि तत्व का प्रभाव स्वर से अधिक पड़ता है। पृथ्वी तत्व में वे काम करने चाहिए जो कि परिश्रम और दृढ़ता चाहते हैं। जल तत्व में जल्दी के काम करने चाहिए। अग्नि तत्व में अत्यन्त किलष्ट और मेहनत के काम करने चाहिए। वायु तत्व और आकाश तत्व के काम प्रायः निष्फल होते हैं। वायु तत्व में शत्रु को हानि पहुंचा सकते हैं और आकाश तत्व में योग साधन कर सकते हैं।
स्वरों का नियमित पालन
स्वरों के नियमित पालन से शारीरिक और मानसिक दोनों उन्नति हो सकती है। प्रातःकाल उठकर यह देखें कि, आज कौन दिन है? पक्ष कौन सा है? तिथि कौन सी ही? कृष्ण पक्ष में तीन तिथियों तक दाहिना स्वर प्रातःकाल पाँच घड़ी तक चलता है, बाद में बायाँ हो जाता है। यदि दिन, तिथि और पक्ष समान हो तो दिन अच्छी तरह से बीतेगा। कोई भी दुर्घटना नहीं होगी। तीन दिन तक लगातार नियमपूर्वक स्वर और तत्वों के चलने से पक्ष बहुत अच्छा बीतता है।
इस शास्त्र के आचार्यों ने अपने अनुभव से बतलाया है कि यदि सूर्य के स्थान में चन्द्रमा की चाल हो तो पहले दो घण्टों में चिन्ता और शोकयुक्त घटना होवे; दूसरे दो घण्टों में धन की हानि तीसरे में यात्रा, चौथे में हानि