श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२१ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९२ ६३९
का समय होगा। साथ में मास्टर, बाबूराम, महेन्द्र, मुखर्जी तथा दो-एक भक्त और हैं। टिकट खरीदने का बन्दोबस्त हो रहा है। नाट्यागार के मैनेजर श्रीयुत गिरीश घोष कुछ कर्मचारियों के साथ श्रीरामकृष्ण की गाड़ी के पास आये। स्वागत करके आदरपूर्वक उन्हें ऊपर ले गये। गिरीश बाबू ने श्रीरामकृष्णदेव का नाम सुना था। वे चैतन्यलीला-अभिनय देखने के लिए आये हैं, यह सुनकर उन्हें बड़ा आनन्द हुआ है। श्रीरामकृष्ण को लोगों ने दक्षिण-पश्चिमवाले बाक्स में बैठाया। पीछे बाबूराम तथा और भी दो-एक भक्त बैठे।
रंगमंच में बत्ती जल गयी। नीचे बहुत से आदमी बैठे हुए थे। श्रीरामकृष्ण की बाईं ओर ड्रापसीन दीख पड़ रहा है। कितने ही बाक्सों में भी आदमी आ गये हैं। बाक्स के पीछे से हवा करने के लिए एक एक पंखा झलनेवाला नौकर है। श्रीरामकृष्ण को भी हवा करने के लिए गिरीश आदमी ठीक कर गये।
रंगमंच देखकर श्रीरामकृष्ण को बालकों की तरह प्रसन्नता हुई है।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से हँसते हुए) – वाह! यहाँ तो बड़ा अच्छा है। आकर बड़ा अच्छा हुआ। बहुत से आदमियों के एक साथ होने से उद्दीपना होती है। तब मैं यथार्थ ही देखता हूँ कि वे ही सब हुए हैं।
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – यहाँ कितना लेगा?
मास्टर – जी, कुछ न लेंगे। आप आये हैं, इसलिए उन्हें बड़ा हर्ष है।
श्रीरामकृष्ण – सब माँ का माहात्म्य है।
ड्रापसीन उठ गया। एक साथ ही दर्शकों की दृष्टि रंगमंच पर पड़ी। पहले पाप और छः रिपुओं की सभा थी। फिर अरण्य-मार्ग में विवेक, वैराग्य और भक्ति की बातचीत थी।
भक्ति कह रही है – नदिया में गौरांग ने जन्म ग्रहण किया है, इसलिए विद्याधरियाँ और ऋषि-मुनि छद्मवेश धारण कर उनके दर्शन करने जा रहे हैं।
विद्याधरियाँ और ऋषि-मुनि गौरांग को अवतार मानकर उनकी स्तुति कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें देखकर भाव में विभोर हो रहे हैं। मास्टर से कह रहे हैं, अहा! देखो, कैसा है!
विद्याधरियाँ और ऋषि-मुनि गाकर श्रीगौरांग की स्तुति कर रहे हैं –
पुरुषगण – केशव कुरु करुणा दीने कुंज-कानन-चारी।
स्त्रियाँ – माधव मनमोहन मोहन-मुरलीधारी॥
सब मिलकर – हरि बोल, हरि बोल, हरि बोल, मन आमार।
पुरुष – ब्रजकिशोर कालीय-हर कातर-भय-भंजन।
स्त्रियाँ – नयन बाँका, बाँका शिखिपाखा, राधिका-हृदिरंजन।
पुरुष – गोवर्धन धारण, वनकुसुम – भूषण, दामोदर कंसदर्पहारी।