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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 663 of 711

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Page 663

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६४० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २१ सितम्बर, १८८४

स्त्रियाँ – श्याम रासरसबिहारी॥
सब – हरि बोल, हरि बोल, हरि बोल, मन आमार।
विद्याधरियों ने जब गाया – 'नयन बाँका, बाँका शिखिपाखा राधिका-हृदिरंजन', तब श्रीरामकृष्ण गम्भीर समाधि में मग्न हो गये। कन्सर्ट (concert) में कई वाद्य एक साथ बज रहे हैं। श्रीरामकृष्ण को कोई होश नहीं।

(६)

चैतन्यलीला-दर्शन। गौर-प्रेम में उन्मत्त श्रीरामकृष्ण

जगन्नाथ मिश्र (श्रीगौरांग के पिता) के घर एक अतिथि आये हैं। बालक निमाई अपने साथियों के साथ आनन्दपूर्वक गा रहे हैं।

अतिथि आँखें मूँदकर भगवान को भोग लगा रहे हैं। निमाई दौड़कर अतिथि के पास पहुँचे और अतिथि के नैवेद्य को खाने लगे। अतिथि समझ गये कि ये ईश्वर के अवतार हैं। वे दस अवतारों की स्तुति को बालक के सामने पढ़कर उसे प्रसन्न करने लगे। मिश्र और शची के पास से विदा होते समय उन्होंने फिर गाकर स्तुतिपाठ किया –

“जय नित्यानन्द गौरचन्द्र जय जय भवतारण!
अनाथत्राण जीवप्राण भीतभयवारण!
युगे युगे रंग, नव लीला नव रंग,
नव तरंग, नव प्रसंग, धराभार-धारण!
तापहारी प्रेमवारि वितर रासरस-बिहारी,
दीनआश, कलुषनाश, दुष्टत्रासकारण!”

स्तुति सुनते ही सुनते श्रीरामकृष्ण को फिर भावावेश हो रहा है।

अब नवद्वीप के गंगातट का दृश्य आया। गंगा नहाकर ब्राह्मणों की स्त्रियाँ और पुरुष घाट पर बैठे हुए पूजा कर रहे हैं। निमाई नैवेद्य छीन-छीनकर खा रहे हैं। एक ब्राह्मण बहुत गुस्सा हो गये। उन्होंने कहा, क्यों रे दुष्ट, विष्णुपूजा का नैवेद्य छीनता है? – तेरा सर्वनाश होगा। निमाई ने फिर भी नैवेद्य छीनकर खाया और फिर वहाँ से चल दिया। बहुत सी औरतें थीं, जो उसे बड़ा प्यार करती थीं। निमाई को जाते देखकर उन्हें जो हार्दिक कष्ट हुआ, उसे वे सह न सकीं। वे उच्च स्वर से पुकारने लगीं, 'निमाई, लौट आ, निमाई लौट आ', पर निमाई ने उनकी एक न सुनी। स्त्रियों में एक निमाई को लौटाने का महामन्त्र जानती थीं। उसने 'हरि बोल, हरि बोल' कहना आरम्भ कर दिया। बस निमाई 'हरि बोल, हरि बोल' कहते हुए लौट पड़े।

मणि श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए हैं। कहा – अहा!

श्रीरामकृष्ण स्थिर न रह सके। 'अहा' कहते हुए मणि की ओर देखकर प्रेमाश्रु वर्षण

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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