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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 661 of 711

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६३८श्रीरामकृष्णवचनामृत२१ सितम्बर, १८८४

हाथीबागान में महेन्द्र मुखर्जी की आटे की चक्की है। उसी कारखाने में श्रीरामकृष्ण को लिए जा रहे हैं। वहाँ जरा देर विश्राम करके स्टार थियेटर में चैतन्यलीला नाटक देखने जायेंगे। महेन्द्र का मकान बाग-बाजार में है, श्रीमदनमोहनजी के कुछ उत्तर तरफ। श्रीरामकृष्ण को उनके पिता नहीं जानते; इसीलिए महेन्द्र उन्हें घर नहीं ले गये। उनके भाई प्रियनाथ भी श्रीरामकृष्ण के भक्त हैं।

महेन्द्र के कारखाने में तख्त पर दरी बिछी हुई है। उसी पर श्रीरामकृष्ण बैठे हुए ईश्वर-प्रसंग कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण — (मास्टर और महेन्द्र से) — चैतन्यचरितामृत सुनते हुए हाजरा कहता है, 'यह सब शक्ति की लीला है — इसके भीतर विभु नहीं हैं।' विभु को छोड़कर शक्ति कभी रह सकती है? यहाँ के मत को उलट देने की चेष्टा!

"मैं जानता हूँ, ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। जैसे जल और उसकी हिमशक्ति, अग्नि और उनकी दाहिका शक्ति। वे विभु के रूप से सर्व भूतों में विराजमान हैं, परन्तु कहीं उनकी शक्ति का अधिक और कहीं कम प्रकाश है। हाजरा यह भी कहता है, 'ईश्वर को पा जाने पर उन्हीं की तरह मनुष्य षडैश्वर्यशाली हो जाता है। षडैश्वर्य रहेंगे जरूर, फिर वह उन्हें अपने काम में लाये या न लाये।' "

मास्टर — षडैश्वर्य मुट्ठी में रहने चाहिए। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण — (सहास्य) — हाँ, मुट्ठी में रहने चाहिए। कैसी हीन बुद्धि हैं! जिसने ऐश्वर्य का कभी भोग नहीं किया, वह 'ऐश्वर्य ऐश्वर्य' चिल्लाकर अधीर होता है। जो शुद्ध भक्त है, वह कभी ऐश्वर्य के लिए प्रार्थना नहीं करता।

श्रीरामकृष्ण शौच को जायेंगे। महेन्द्र ने गडुए में पानी मँगवाया और गडुए को खुद हाथ में ले लिया। श्रीरामकृष्ण को साथ लेकर मैदान की ओर जायेंगे।

श्रीरामकृष्ण ने सामने मणि को देखकर महेन्द्र से कहा, तुम्हें न लेना होगा, इन्हें दे दो।

मणि गड़ुआ लेकर श्रीरामकृष्ण के साथ कारखाने के भीतरवाले मैदान की ओर गये। हाथ-मुख धो चुकने के बाद श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, "क्या सन्ध्या हो गयी? सन्ध्या होने पर सब काम छोड़कर ईश्वरचिन्तन करना चाहिए।"

यह कहकर श्रीरामकृष्ण हाथ के रोएँ देख रहे हैं — गिने जा सकते हैं या नहीं। रोएँ अगर न गिने जा सकें तो समझना चाहिए कि सन्ध्या हो गयी।

(५)

थियेटर में चैतन्यलीला। समाधि में श्रीरामकृष्ण

श्रीरामकृष्ण बीडन स्ट्रीट में स्टार थियेटर के सामने आ गये। रात के साढ़े आठ बजे

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar