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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 534 of 711

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Page 534
२५ मई, १८८४परिच्छेद ८१५११

कहा, “क्या दे रहे थे अब दीजिये। जब साधु बना था तब रुपये नहीं छू सका, अब चार आने भी मिल जायें तो न छोड़ें।'

“परन्तु मनुष्य परमहंस की अवस्था में बालक हो जाता है। पाँच वर्ष के बालक को स्त्री-पुरुष का ज्ञान नहीं होता। फिर भी लोक-शिक्षण के लिए परमहंस को सावधान रहना पड़ता है।”

श्रीयुत केशव सेन कामिनी-कांचन के भीतर थे, इसीलिए लोक-शिक्षण में बाधा पड़ी थी। श्रीरामकृष्ण यही बात कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – ये – (केशव) – समझे?

विजय – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – इधर-उधर दोनों की रक्षा के लिए बढ़े, इसीलिए विशेष कुछ न कर सके।

विजय – चैतन्यदेव ने नित्यानन्द से कहा, 'नित्यानन्द, अगर मैं संसार का त्याग न करूंगा, तो लोगों का कल्याण न होगा। मुझे देखकर सब लोग संसार में रहना ही पसन्द करेंगे। कामिनी-कांचन का त्याग करके श्रीभगवान के पादपद्मों में सम्पूर्ण मन समर्पित कर देने की चेष्टा फिर कोई न करेगा।'

श्रीरामकृष्ण – चैतन्यदेव ने लोक-शिक्षा के लिए ही संसार का त्याग किया था।

“साधु-संन्यासी को अपने कल्याण के लिए भी कामिनी-कांचन का त्याग करना चाहिए। और निर्लिप्त होने पर भी लोक-शिक्षा के लिए उसे अपने पास कामिनी-कांचन न रखना चाहिए। संन्यासी – जगद्गुरु! उसे देखकर लोगों में चेतना आती है।”

सन्ध्या होने को है। भक्तगण क्रमशः प्रणाम करके बिदा हो रहे हैं। विजय केदार से कह रहे हैं – आज सुबह मैंने आपको देखा था (ध्यान में); देह में हाथ लगाना चाहा, पर फिर कहीं कोई नहीं!