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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 533 of 711

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Page 533

५१० श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४

(४)

संन्यासी का कठिन व्रत। संन्यासी और लोकशिक्षा

श्रीरामकृष्ण गंगा के किनारेवाले गोल बरामदे में बैठे हुए हैं। पास ही विजय, भवनाथ, मास्टर, केदार आदि भक्तगण हैं। श्रीरामकृष्ण एक एक बार कह रहे हैं, हा कृष्ण चैतन्य!

श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों से) – घर में खूब राम नाम किया गया है, कोई कहता था, इसीसे खूब रंग जमा!

भवनाथ – तिस पर संन्यास की बात!

श्रीरामकृष्ण – अहा! क्या भाव है!

यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने गौरांग पर एक गाना गाया। गीत के समाप्त होने पर आपने विजय आदि भक्तों से कहा – “कीर्तन में बहुत ही अच्छा कहा है! – संन्यासी को नारी की ओर नजर भी उठाकर न देखना चाहिए, संन्यासी का धर्म यही है।”

विजय – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – संन्यासी को देखकर लोग शिक्षा लेंगे न, इसीलिए इतना कठोर नियम है। संन्यासी को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। उसके लिए ऐसा कठोर नियम है। काला बकरा माता की बलि पर चढ़ाया जाता है, परन्तु जरा भी कहीं घाव हुआ तो फिर उसकी बलि नहीं दी जाती। स्त्रियों का संग तो करना ही नहीं चाहिए। इतना ही नहीं वरन् उनसे बातचीत करना भी संन्यासी के लिए निषिद्ध है।

विजय – छोटे हरिदास ने एक भक्त स्त्री के साथ बातचीत की थी, चैतन्यदेव ने हरिदास का त्याग कर दिया था।

श्रीरामकृष्ण – संन्यासी के लिए कामिनी-कांचन, जैसे सुन्दरी स्त्री के लिए उसके देह की एक खास बदबू। वह बदबू रही तो सब सौन्दर्य ही वृथा है।

“मारवाड़ी ने मेरे नाम से रुपये लिख देना चाहा – मथुर ने जमीन लिख देना चाहा, परन्तु मैं यह कुछ न ले सका।

“संन्यासी के लिए बड़े कठिन नियम हैं। जब साधु-संन्यासी का भेष किया, तब उसे ठीक ठीक साधुओं और संन्यासियों का काम करना चाहिए। थिएटर में देखा नहीं? जो राजा बनता है, वह राजा की ही तरह रहता है, जो मन्त्री बनता है, वह ठीक उसी तरह के आचरण करता है।

“किसी बहुरुपिये ने त्यागी साधु का स्वाँग दिखाया, बिलकुल साधु बन गया। दर्शकों ने उसे एक तोड़ा रुपया देना चाहा। वह ‘उँह’ कहकर चला गया। तोड़ा छुआ तक नहीं। परन्तु थोड़ी देर बाद, देह और हाथ-पैर धोकर अपने कपड़े पहनकर वह आया।