श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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| ४९० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ अप्रैल, १८८४ |
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न्योता देना भूल गये थे। राम बड़े अभिमानी हैं – उन्होंने लोगों से उसके लिए दुःख प्रकट किया था। इसीलिए अधर राम के घर गये थे। उनसे भूल हुई थी, इसके लिए दुःख प्रकट करने गये थे।
राम – वह अधर का दोष नहीं है। न्योता देने का भार राखाल पर था।
श्रीरामकृष्ण – राखाल का दोष लेना ही नहीं चाहिए। गला दबाओ तो अब भी दूध निकल आये।
राम – महाराज, कहते क्या हैं, चण्डी के गीत हुए – ?
श्रीरामकृष्ण – अधर यह नहीं जानता था। देखो न, उस दिन यदु मल्लिक के यहाँ मेरे साथ गया था। मैंने लौटते समय पूछा, तुमने सिंहवाहिनी को प्रणामी दी? उसने कहा, महाराज, मैं नहीं जानता था कि प्रणामी देनी पड़ती है।
“अच्छा, अगर न भी कहा हो, तो राम-नाम में दोष क्या है? जहाँ राम-नाम होता हो वहाँ बिना बुलाये भी जाया जाता है। न्योते की आवश्यकता नहीं होती।”
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