श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in contextपरिच्छेद ८०
आत्मदर्शन के उपाय
(१)
फलहारिणी पूजा तथा विद्यासुन्दर कृत नाटक का अभिनय
श्रीरामकृष्ण उसी पूर्वपरिचित कमरे में बैठे हैं दिन के ११ बजे का समय हुआ। राखाल, मास्टर आदि भक्तगण उसी कमरे में उपस्थित हैं। गत रात्रि में फलहारिणी काली की पूजा हो गयी। उस उत्सव के उपलक्ष्य में सभा-मण्डप में रात्रि के तीसरे पहर से नाटक का अभिनय शुरू हुआ है – विद्यासुन्दर कृत नाटक।
श्रीरामकृष्ण ने प्रातःकाल काली माता के दर्शन को जाते समय थोड़ा अभिनय भी देखा है। नाटकवाले लोग स्नान आदि कर चुकने के बाद श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आये हैं।
शनिवार, २४ मई १८८४ ई., अमावस्या।
गोरे रंग का जो लड़का ‘विद्या’ बना था उसने अच्छा अभिनय किया था। श्रीरामकृष्ण आनन्द से उसके साथ ईश्वर सम्बन्धी अनेक बातें कर रहे हैं। भक्तगण उत्सुक होकर सब सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (विद्या के अभिनेता के प्रति) – तुम्हारा अभिनय बहुत अच्छा हुआ। यदि कोई गाने में, बजाने में, नाचने में या किसी भी एक विद्या में प्रवीण हो, तो वह चेष्टा करने पर शीघ्र ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।
‘मृत्यु की याद करो।’ ‘अभ्यासयोग’
“और तुम लोग जिस प्रकार देर तक अभ्यास करके गाना, बजाना या नाचना सीखते हो, उसी प्रकार ईश्वर में मन लगाने का अभ्यास करना होता है। पूजा, जप, ध्यान, इन सब का नियमित रूप से अभ्यास करना पड़ता है।
“क्या तुम्हारा विवाह हो गया है? कोई बाल-बच्चे हैं?”
विद्या – जी, एक लड़की का देहान्त हो गया है, फिर एक सन्तान हुई है।
श्रीरामकृष्ण – इसी बीच में हुआ और मर भी गया। तुम्हारी यह कम उम्र! कहते