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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 504 of 711

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Page 504
५ अप्रैल, १८८४परिच्छेद ७९४८१

“अब चिन्ता है, सब को किस तरह भोजन कराया जाय। सब को भोजन कराने की इच्छा होती है। इसलिए एक-एक आदमी को यहाँ रखकर भोजन कराता हूँ।”

प्राणकृष्ण – (मास्टर को देखकर, सहास्य) – अच्छा आदमी है! (श्रीरामकृष्ण से) महाराज, नाव से उतरकर ही दम लिया!

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – क्या हुआ?

प्राणकृष्ण – ये नाव पर चढ़े थे; जरा सी लहर की टक्कर लगी और इन्होंने कहा, उतार दो हमको – (मास्टर से) किस तरह फिर आये आप?

मास्टर – (सहास्य) – पैदल चलकर।

संसारी लोगों के लिए विषय-कर्मत्याग कठिन है

प्राणकृष्ण – (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, अब सोच रहा हूँ, काम छोड़ दूँगा। काम करने लगा, तो फिर और कुछ नहीं होगा। इन्हें (साथ के एक बाबू की ओर इशारा करके) काम सिखा रहा हूँ। मेरे छोड़ देने पर ये काम करेंगे, अब और नहीं होता।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, बड़ी झंझट है। इस समय कुछ दिन निर्जन में ईश्वर-चिन्तन करना बहुत अच्छा है। तुम कहते तो हो कि छोड़ोगे। कप्तान ने भी यही बात कही थी। संसारी आदमी कहते तो हैं, पर कर नहीं सकते।

“कितने ही पण्डित हैं जो ज्ञान की बातें कहा करते हैं। वे मुख ही से कहते हैं, काम कुछ नहीं कर सकते। जैसे गिद्ध उड़ता तो बहुत ऊँचे है, परन्तु उसकी नजर मरघट पर ही रहती है। अर्थात् उसी कामिनी-कांचन पर – संसार पर आसक्ति। अगर मैं सुनता हूँ कि किसी पण्डित को विवेक-वैराग्य है तो मुझे सचमुच उनसे श्रद्धापूर्ण भय होता है और नहीं तो वे सब भेड़-बकरे-से ही जान पड़ते हैं।”

प्राणकृष्ण प्रणाम करके बिदा हुए। उन्होंने मास्टर से चलने के लिए पूछा। मास्टर ने कहा; मैं अभी न जाऊँगा, आप चलिये। प्राणकृष्ण ने हँसते हुए कहा, तुम अब और नाव पर कदम रखोगे? (सब हँसते हैं।)

मास्टर ने पंचवटी में थोड़ी देर टहलकर, जिस घाट में श्रीरामकृष्ण नहाते थे, उसी में नहाया। इसके बाद श्रीभवतारिणी और राधाकान्त के दर्शन किये। वे सोच रहे हैं, मैंने सुना था ईश्वर निराकार हैं, तो फिर क्यों मैं इस मूर्ति के सामने प्रणाम कर रहा हूँ? क्या श्रीरामकृष्ण साकार देव-देवियों को मानते हैं इसलिए? मैं तो ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं समझता; परन्तु जब कि श्रीरामकृष्ण मानते हैं, तो मैं किस खेत की मूली हूँ – मानना ही होगा।

मास्टर श्रीभवतारिणी माता के दर्शन कर रहे हैं। देखा, उनके दोनों बायें हाथों में खड्ग और नरमुण्ड शोभा दे रहे हैं, दोनों दाहिने हाथों में वर और अभय। एक ओर वे