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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 505 of 711

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Page 505
४८२श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अप्रैल, १८८४

भयंकरा मूर्ति हैं और दूसरी ओर भक्तवत्सला मातृमूर्ति। उनमें दो भावों का एकत्र समावेश हो रहा है। भक्तों के निकट, अपने दीन-हीन जीवों के निकट, माता दयामयी और स्नेहमयी के स्वरूप में आती हैं और यह भी सत्य है कि वे भयंकरा और कालकामिनी भी हैं। एक ही आधार में ये दो भाव क्यों हैं, इसका हाल तो वे ही जानें।

मास्टर श्रीरामकृष्ण की व्याख्या याद कर रहे हैं। सोच रहे हैं – सुना है, केशव सेन ने भी श्रीरामकृष्ण के पास देवी-प्रतिमा का अस्तित्व स्वीकार कर लिया था। 'क्या यही मृण्मय आधार में चिन्मयी मूर्ति है?' केशव यही बात कहते थे।

अब वे श्रीरामकृष्ण के पास आकर बैठे। वे नहा चुके हैं, यह देखकर श्रीरामकृष्ण ने उन्हें फलमूल प्रसाद खाने के लिए दिया। गोल बरामदे में आकर उन्होंने प्रसाद पाया। पानीवाला लोटा बरामदे में ही रह गया था। वे जल्दी से श्रीरामकृष्ण के पास आकर कमरे में बैठ ही रहे थे कि श्रीरामकृष्ण ने कहा, तुम लोटा नहीं लाये?

मास्टर – जी हाँ, लाता हूँ।

श्रीरामकृष्ण – वाह!

मास्टर का चेहरा फीका पड़ गया। बरामदे से लोटा लाकर कमरे में रखा।

मास्टर का घर कलकत्ते में है। घर में शान्ति न मिलने के कारण उन्होंने श्यामपुकुर में किराये का मकान लिया है। उनका स्कूल भी वहीं है। उनके अपने मकान में उनके पिता और भाई रहते हैं। श्रीरामकृष्ण की इच्छा है कि वे अपने मकान में आकर रहें; क्योंकि एक ही घर और एक ही थाली के खानेवालों में भजन-पूजन करने की बड़ी सुविधा है। यद्यपि श्रीरामकृष्ण बीच-बीच में ऐसा कहते थे, तथापि दुर्भाग्यवश मास्टर अपने घर वापस नहीं जा सके। आज श्रीरामकृष्ण ने फिर वही बात उठायी।

श्रीरामकृष्ण – क्यों, अब तुम घर जाओगे?

मास्टर – मेरा तो वहाँ रहने के लिए किसी तरह जी नहीं चाहता।

श्रीरामकृष्ण – क्यों, तुम्हारा बाप मकान गिरवाकर वहाँ नयी इमारत खड़ी कर रहा है।

मास्टर – घर में मुझे बड़ी तकलीफ मिली है। वहाँ जाने को मेरा किसी तरह मन नहीं होता।

श्रीरामकृष्ण – तुम किससे डरते हो?

मास्टर – सब से।

श्रीरामकृष्ण – (गम्भीर स्वर में) – वह भय वैसा ही है जैसा तुम्हें नाव पर चढ़ते समय होता है।

देवताओं का भोग लग गया। आरती हो रही है। कालीमन्दिर में आनन्द हो रहा है। आरती का शब्द सुनकर, कंगाल, साधु, फकीर, सब अतिथि-शाला में दौड़े आ रहे हैं।