श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 503 of 711
Read in context| ४८० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ अप्रैल, १८८४ |
|---|
और हठयोग करते हैं। रोटी-भात, यह कुछ नहीं खाते। अफीम और दूध के दाम उनके पास नहीं हैं। श्रीरामकृष्ण जब पंचवटी के पास गये थे तब वे हठयोगी से बातचीत करके आये थे। हठयोगी ने राखाल से कहा था, 'परमहंसजी से कहकर मेरी कोई व्यवस्था करा देना।' श्रीरामकृष्ण ने कहला भेजा था कि कलकत्ते के बाबू जब आयेंगे तब उनसे कहा जायगा।
हठयोगी – (श्रीरामकृष्ण से) – आपने राखाल से क्या कहा था?
श्रीरामकृष्ण – कहा था, बाबुओं से कहूँगा। अगर वे कुछ देंगे तो दे देंगे। परन्तु क्यों – (प्राणकृष्णादि से) तुम शायद इन्हें like (पसन्द) नहीं करते?
प्राणकृष्ण चुपचाप बैठे रहे।
(हठयोगी चला जाता है।)
श्रीरामकृष्ण की बातचीत होने लगी।
श्रीरामकृष्ण – (प्राणकृष्णादि भक्तों से) – और संसार में रहने पर सत्य का खूब ध्यान चाहिए। सत्य से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है। मेरी तो इस समय सत्य की दृढ़ता कुछ कम हो गयी है, पहले बहुत थी। 'नहाऊँगा' यह कहा नहीं कि गंगा में उतरा, मन्त्रोच्चारण किया, सिर पर पानी भी डाला, परन्तु फिर भी सन्देह होता था कि शायद अच्छी तरह नहाना अभी नहीं हुआ। अमुक स्थान पर शौच के लिए जाऊँगा यह सोचा नहीं कि वहीं गया। राम के मकान गया, कलकत्ते में। कह दिया कि पूड़ियाँ न खाऊँगा। जब खाने को दिया गया, तब देखा, भूख लगी है; परन्तु कह जो दिया है कि पूड़ियाँ न खाऊँगा तो मजबूरन मिठाई से पेट भरा। (सब हँसते हैं।) इस समय तो दृढ़ता कुछ घट गयी है। टट्टी की हाजत नहीं है, परन्तु कह डाला है कि टट्टी जाऊँगा, क्या किया जाय? राम* से पूछा, उसने कहा, नहीं लगी है तो जाकर क्या कीजियेगा? तब मैंने विचार किया, सभी तो नारायण हैं, राम भी नारायण है, उसकी बात क्यों न मानूँ? हाथी नारायण है, परन्तु महावत भी तो नारायण है। महावत जिस समय कह रहा है, हाथी के पास मत आओ, उस समय उसकी बात क्यों न मानी जाय? इस तरह विचार करके अब पहले की अपेक्षा दृढ़ता कुछ घट गयी है।
"अब इस समय देख रहा हूँ, एक और अवस्था आ रही है। बहुत दिन हुए वैष्णवचरण ने कहा था, आदमी के भीतर जब ईश्वर के दर्शन होंगे, तब पूर्ण ज्ञान होगा। अब देख रहा हूँ, अनेक रूपों में वही विचरण कर रहे हैं। कभी साधु के रूप में, कभी छल-रूप में, और कभी खल-रूप में। इसीलिए कहता हूँ, साधुरूपी नारायण, छलरूपी नारायण, खलरूपी नारायण, लुच्चारूपी नारायण।
* राम चटर्जी – दक्षिणेश्वर मन्दिर के एक पुजारी।