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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 502 of 711

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Page 502

५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४७९


करके मनुष्य समाधि में आत्मदर्शन करता है।

“विज्ञान अर्थात् विशेष रूप से ज्ञान प्राप्त करना। किसी ने दूध का नाम ही नाम सुना है, किसी ने दूध देखा भर है और किसी ने दूध पिया है। जिसने सिर्फ सुना है, वह अज्ञानी है, जिसने देखा है वह ज्ञानी है, और जिसने पिया है, वह विज्ञानी है, विशेष रूप से ज्ञान उसी को हुआ है। ईश्वर को देखकर उनसे वार्तालाप करना, जैसे वे परम आत्मीय हों, इसी का नाम विज्ञान है।

“पहिले 'नेति-नेति' किया जाता है। वे पंचभूत नहीं हैं, मन, बुद्धि, अहंकार भी नहीं हैं; वे सब तत्त्वों से परे हैं। छत पर चढ़ना होगा, सब सीढ़ियों को एक एक करके छोड़ जाना होगा। सीढ़ियाँ कभी छत नहीं हैं, परन्तु छत पर पहुँचकर देखा जाता है, जिन चीजों से छत बनी है – ईंट-चूना-सुरखी – उन्हीं चीजों से सीढ़ियाँ भी बनी हैं, पर सीढ़ियाँ कभी छत नहीं हैं। जो परब्रह्म हैं वे ही जीव-जगत् और चौबीसों तत्त्व भी हुए हैं। जो आत्मा हैं वे ही पंचभूत भी हुए हैं। मिट्टी इतनी कड़ी क्यों है अगर वह आत्मा से ही हुई है? उनकी इच्छा से सब हो सकता है। हाड़ और मांस, शोणित और शुक्र से ही तो होते हैं। समुद्र का फेन कितना कड़ा होता है!

क्या गृहस्थ को विज्ञान हो सकता है? साधना चाहिए

“विज्ञान के होने पर संसार में भी रहा जा सकता है। तब अच्छी तरह अनुभव हो जाता है कि जीव और जगत् वे ही हुए हैं, वे संसार से अलग नहीं हैं। श्रीरामचन्द्र ने ज्ञान-लाभ के पश्चात् जब कहा कि मैं संसार में न रहूँगा, तब दशरथ ने समझाने के लिए वशिष्ठ को उनके पास भेजा। वशिष्ठ ने कहा, 'राम! यदि संसार ईश्वर से अलग हो तो तुम इसे छोड़ सकते हो।' श्रीरामचन्द्र चुप हो रहे। वे अच्छी तरह जानते थे, ईश्वर से अलग कोई चीज नहीं है। उन्हें फिर संसार न छोड़ना पड़ा। बात यह है कि दिव्य दृष्टि चाहिए। मन के शुद्ध होने पर ही वह दृष्टि होती है। देखो न, कुमारी-पूजा क्या है। मल और मूत्र त्याग करके आयी हुई लड़कियाँ, उन्हें मैंने देखा – साक्षात् भगवती की मूर्ति। एक ओर स्त्री है और एक ओर बच्चा; दोनों को मनुष्य प्यार कर रहा है, किन्तु भाव भिन्न हैं, तात्पर्य यह है कि खेल सब मन का है। शुद्ध मन में एक खास भाव होता है। उस मन को प्राप्त कर लेने पर इसी संसार में ईश्वर के दर्शन होते हैं। अतएव साधना चाहिए।

“साधना चाहिए। यह समझ लेना चाहिए कि स्त्रियों पर सहज ही आसक्ति हो जाती है। स्त्रियाँ स्वभाव से ही पुरुषों को प्यार करती हैं। पुरुष स्वभाव से ही स्त्रियों को प्यार करते हैं। दोनों इसीलिए जल्दी गिर जाते हैं।”

(हठयोगी आता है।)

पंचवटी में कई दिनों से एक हठयोगी रहते हैं। वे सिर्फ दूध और अफीम खाते हैं