श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| ४६० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ९ मार्च, १८८४ |
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“मैं जानता हूँ कि यदि कोई पहाड़ की गुफा में रहता हो, देह पर भभूत मलता हो, उपवास करता हो, अनेक प्रकार के कठोर तप करता हो परन्तु भीतर भीतर उसका विषय की ओर मन रहता हो – कामिनी-कांचन में मन रहता हो – तो उसे मैं धिक्कारता हूँ। और जिसका कामिनी-कांचन में मन नहीं होता है – खाता पीता और मस्त घूमता है, उसे धन्य कहता हूँ।
(मणि मल्लिक को दिखाकर) “इनके घर में साधुओं के चित्र नहीं हैं। साधुओं के चित्र देखने पर ईश्वर का उद्दीपन होता है।”
मणिलाल – हाँ नन्दिनी* के कमरे में एक मेम का चित्र है – विश्वासरूपी पहाड़ को पकड़कर एक व्यक्ति है, नीचे गम्भीर समुद्र है, विश्वास छोड़ने पर एकदम अतल जल में जा गिरेगा।
“एक और है – कुछ लड़कियाँ दूल्हे के आने की प्रतीक्षा में दिपक में तेल भरकर जगती हुई बैठी हैं। जो सो जायगी, वह देख न सकेगी। ईश्वर का वर्णन दूल्हा कहकर किया गया है (Parable of the ten Virgins)।
श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – यह अच्छा है।
मणिलाल – और भी चित्र हैं। – विश्वास का वृक्ष तथा पाप और पुण्य के चित्र।
श्रीरामकृष्ण – (भवनाथ के प्रति) – अच्छे चित्र हैं सब; तू देखने को जाना।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “कभी-कभी इन बातों पर सोचता हूँ तो ये सब अच्छी नहीं लगतीं। पहले एक बार पाप पाप सोचना होता है, कैसे पाप से मुक्ति मिले, परन्तु उनकी कृपा से एक बार प्रेम यदि आ जाय, एक बार प्रेमाभक्ति यदि हो जाय तो पाप पुण्य सब भूल जाता है। उस समय वह शास्त्र के विधि-निषेध के परे चला जाता है। पश्चात्ताप करना पड़ेगा, प्रायश्चित्त करना होगा, – यह सब चिन्ता फिर नहीं रह जाती।
“मानो टेढ़ी नदी में से होकर बहुत कष्ट से और काफी देर के बाद अपने गन्तव्य स्थान पर जा रहे हो। परन्तु यदि बाढ़ आ जाय तो सीधे रास्ते से थोड़े ही समय में उस स्थान पर पहुँच सकते हो। उस समय जमीन पर भी काफी जल हो जाता है।
“प्रथम स्थिति में काफी घूमना पड़ता है, बहुत कष्ट करना पड़ता है।
“प्रेमाभक्ति होने पर बहुत सरल हो जाता है, जैसे धान काट लेने के बाद मैदान में जिधर चाहो, जाओ। पहले मेड़ पर से घूम घूमकर जाना पड़ता था। अब जिधर से चाहो, जाओ। यदि कुछ कूड़ा-कर्कट पड़ा हो, तो जूता पहनकर जाने से फिर कोई कष्ट ही नहीं होता। विवेक, वैराग्य, गुरु के वाक्य पर विश्वास – ये सब रहने पर फिर कोई कष्ट नहीं है।”
* नन्दिनी – मणि मल्लिक की विधवा कन्या, श्रीरामकृष्ण की भक्तिनी।