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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

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Page 482
९ मार्च १८८४परिच्छेद ७७४५९

है कि उसके समान अपना और कोई नहीं है। क्या दुर्दशा है! बीस रुपये वेतन, तीन बच्चे हुए हैं - उन्हें अच्छी तरह से खिलाने की शक्ति नहीं है - मकान की छत से पानी टपकता है, मरम्मत कराने को पैसा नहीं है - लड़के को नयी पुस्तकें खरीद कर नहीं दे सकता - लड़के का यज्ञोपवीत-संस्कार नहीं कर सकता - किसी से आठ आना, किसी से चार आना करके भीख माँगता है!

“विद्यारूपिणी स्त्री वास्तव में सहधर्मिणी है। वह स्वामी के ईश्वर-पथ में जाने में विशेष सहायता करती है। एक-दो बच्चे होने के बाद दोनों आपस में भाई-बहन की तरह रहते हैं। दोनों ही ईश्वर के भक्त हो जाते हैं - दास तथा दासी। उनकी गृहस्थी विद्या की गृहस्थी है। ईश्वर और भक्तों को लेकर सदा आनन्द मनाते हैं। वे जानते हैं, ईश्वर ही एकमात्र अपना है - चिरकाल के लिए अपना। सुख में, दुःख में कभी उन्हें नहीं भूलते - जैसे पाण्डव।

“संसारियों का ईश्वरप्रेम क्षणिक है - जैसे तपाये हुए तवे पर जल पड़ा हो - 'छुन्' शब्द हुआ - और उसके बाद ही सूख गया। संसारी लोगों का मन भोग की ओर रहता है इसलिए वह अनुराग, वह व्याकुलता नहीं होती।

“एकादशी तीन प्रकार की होती है। प्रथम निर्जला एकादशी, जल तक नहीं पिया जाता; इसी प्रकार, फकीर पूर्ण त्यागी होते हैं - एकदम सब भोगों का त्याग। दूसरी में दूधमिठाई खायी जाती है - मानो भक्त ने घर में मामूली भोग रखा है। तीसरी - वह जिसमें हलवापूरी खायी जाती है - खूब भर पेट खा रहा है; इधर रोटी दूध में भी छोड़ रखी है - बाद में खायगा!

“लोग साधन-भजन करते हैं, परन्तु मन रहता है स्त्री तथा धन की ओर; मन भोग की ओर रहता है, इसीलिए साधन-भजन ठीक नहीं होता।

“हाजरा यहाँ पर बहुत जप-तप करता था, परन्तु घर में स्त्री, बच्चे, जमीन आदि थी, इसलिए जप-तप भी करता है, भीतर भीतर दलाली भी करता है। इन सब लोगों की बातों की स्थिरता नहीं रहती। कभी कहता है, 'मछली नहीं खाऊँगा', पर फिर खाता है।

“धन के लिए लोग क्या नहीं कर सकते। ब्राह्मणों से, साधुओं से कुली का काम ले सकते हैं!

“मेरे कमरे में कभी कभी सन्देश सड़ तक जाता था, फिर भी मैं उसे संसारी लोगों को दे नहीं सकता था। दूसरों के शौच के लोटे का जल ले सकता था परन्तु ऐसे लोगों का तो लोटा भी नहीं छू सकता था।

“हाजरा धनवानों को देखने पर उन्हें अपने पास बुलाता था - बुलाकर लम्बी लम्बी बातें सुनाता था और उनसे कहता था, 'राखाल आदि जिन्हें देख रहे हो वे जप-तप नहीं कर सकते - हो हो करके घूमते हैं।'