श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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| ९ मार्च १८८४ | परिच्छेद ७७ | ४६१ |
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निराकार ध्यान और साकार ध्यान
मणिलाल – (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – अच्छा, ध्यान का क्या नियम है? कहाँ पर ध्यान करना चाहिए?
श्रीरामकृष्ण – प्रसिद्ध स्थान है हृदय। हृदय में ध्यान हो सकता है अथवा सहस्रार में। ये सब विधि के अनुसार ध्यान शास्त्रों में हैं। फिर तुम्हारी जहाँ इच्छा हो ध्यान कर सकते हो। सभी स्थान तो ब्रह्ममय हैं, वे कहाँ नहीं हैं?
“जिस समय बलि की उपस्थिति में नारायण ने तीन पदों से स्वर्ग, मृत्यु, पाताल ढँक लिया था। उस समय क्या कोई स्थान बाकी बचा था! गंगातट जैसा पवित्र है वैसा ही वह स्थान भी जहाँ कूड़ाकर्कट है। फिर यह बात भी है कि ये सब उन्हीं की विराट मूर्ति हैं।
“निराकार ध्यान बहुत ही कठिन है। उस ध्यान में तुम जो कुछ देख या सुन रहे हो – उन सब को हटा देना चाहिए। फिर केवल तुम्हारे सत्य स्वरूप का चिन्तन रह जाता है। इसी स्वरूप का चिन्तन कर शिव नृत्य करते हैं। ‘मैं क्या हूँ’, ‘मैं क्या हूँ’, कहकर नृत्य करते हैं।
“इसे कहते हैं शिवयोग। इस ध्यान के समय कपाल की ओर दृष्टि रखनी होती है। ‘नेति’ ‘नेति’ कहकर जगत् को छोड़ अपने स्वरूप का चिन्तन।
“और एक है विष्णुयोग। नासिका के अग्रभाग में दृष्टि। आधी भीतर, आधी बाहर। साकार ध्यान में इसी प्रकार होता है।
“शिव कभी कभी साकार चिन्तन करते हुए नाचते हैं – ‘राम’ ‘राम’ कहकर नाचते हैं।”
(३)
मणिलाल मल्लिक पुराने ब्राह्म-समाजी हैं। भवनाथ, राखाल, मास्टर बीच बीच में ब्रह्म समाज में जाते थे। श्रीरामकृष्ण ओंकार की व्याख्या तथा यथार्थ ब्रह्मज्ञान और उसके बाद की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं।
अनाहत ध्वनि तथा परम पद
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – ॐ शब्द ब्रह्म है, ऋषि मुनि लोग उसी शब्द को प्राप्त करने के लिए तपस्या करते थे। सिद्ध होने पर साधक सुनता है कि नाभि से वह शब्द स्वयं ही उठ रहा है – अनाहत शब्द।
“एक मत है कि केवल शब्द सुनने से क्या होगा? दूर से समुद्र के शब्द का कल्लोल सुनायी देता है। उस शब्द-कल्लोल के सहारे धीरे धीरे आगे बढ़ने से तुम समुद्र
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar