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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 481 of 711

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Page 481

४५८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ९ मार्च, १८८४

बैठा है, और दूसरा चित्र, योगी गांजा की चिलम मुँह में लगाकर पी रहा है, और उसमें से एकाएक आग जल उठती है।

“इन सब चित्रों से काफी उद्दीपन होता है। जिस प्रकार मिट्टी का बनावटी आम देखकर सच्चे आम का उद्दीपन होता है।

“परन्तु योग में विघ्न है – कामिनी-कांचन। यह मन शुद्ध होने पर योग होता है। मन का निवास है कपाल में (आज्ञाचक्र में), परन्तु दृष्टि रहती है लिंग, गुदा और नाभि में – अर्थात् कामिनी और कांचन में। साधना करने पर उस मन की ऊपर की ओर दृष्टि होती है।

“कौनसी साधना करने पर मन की दृष्टि ऊपर की ओर होती है? सदा साधुपुरुषों का संग करने से सब जाना जा सकता है।

“ऋषिगण सदा या तो निर्जन में या साधुओं के संग में रहा करते थे – इसीलिए उन्होंने बिना क्लेश के ही कामिनी-कांचन का त्याग कर ईश्वर में मन लगा लिया था – निन्दा-भय कुछ भी नहीं है।

“त्याग करना हो तो ईश्वर से पुरुषकार के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। जो मिथ्या जँचे, उसका उसी समय त्याग करना उचित है।

“ऋषियों का यह पुरुषकार था। इसी पुरुषकार के द्वारा ऋषियों ने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की थी।

“कछुआ अगर हाथ पैर भीतर समेट ले, तो टुकड़े टुकड़े कर डालने पर भी वह हाथपैर नहीं निकालेगा!

“विषयी लोग कपटी होते हैं – सरल नहीं होते। मुँह से कहते हैं, ‘ईश्वर से प्रेम करता हूँ’, परन्तु उनका विषयों पर जितना आकर्षण तथा कामिनी-कांचन में जितना प्रेम रहता है, उसका एक अंश भी ईश्वर की ओर नहीं रहता। परन्तु मुँह से कहते हैं, ‘ईश्वर से प्रेम करता हूँ।’ (मणि मल्लिक के प्रति) कपटीपन छोड़ो।”

मणिलाल – मनुष्य के साथ या ईश्वर के साथ?

श्रीरामकृष्ण – सभी के साथ। मनुष्य के साथ भी, और ईश्वर के साथ भी – कपट कभी नहीं करना चाहिए।

“भवनाथ कैसा सरल है! विवाह करके आकर मुझसे कहता है, ‘स्त्री पर मेरा इतना प्रेम क्यों हो रहा है?’ अहा, वह बहुत ही सरल है।

“तो, स्त्री पर प्रेम नहीं होगा? यह जगन्माता की भुवनमोहिनी माया है। स्त्री को देखकर ऐसा लगता है मानो उसके समान अपना संसार भर में और कोई नहीं है – मानो वह उसका जीवन ही है, इहलोक और परलोक दोनों में!

“पर इसी स्त्री को लेकर मनुष्य क्या क्या दुःख नहीं भोग रहा है, फिर भी समझता