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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

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Page 480
९ मार्च १८८४परिच्छेद ७७४५७

में एशियाटिक म्युजियम के पास हुई थी। वे कह रहे हैं, “कितने राजाओं ने मूल्यवान चीजें भेजी हैं; सोने के पलंग आदि देखने योग्य चीजें हैं।”

श्रीरामकृष्ण तथा धन-ऐश्वर्य। योगी का चित्र

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति हँसते हुए) – हाँ, वहाँ जाने पर एक लाभ अवश्य होता है। ये सब सोने की चीजें – राजामहाराजाओं की चीजें देखकर बिलकुल क्षुद्र-सी मालूम होती हैं। यह भी बड़ा लाभ है। जब मैं कलकत्ता आता था, तो हृदय मुझे गवर्नर का मकान दिखाता था, कहता था, ‘मामाजी, वह देखो, गवर्नर साहब का मकान, बड़े बड़े खम्भे!’ माँ ने दिखा दिया, कुछ मिट्टी की बनी ईंटें एक के ऊपर दूसरी रखकर सजायी हुई हैं!

“भगवान् और उनका ऐश्वर्य। ऐश्वर्य दो दिन के लिए है; भगवान् ही सत्य हैं। जादूगर और उसका जादू। जादू देखकर सभी लोग विस्मित हो जाते हैं, परन्तु सब झूठा है, जादूगर ही सत्य है। मालिक और उसका बगीचा। बगीचा देखकर बगीचे के मालिक की खोज करनी चाहिए।”

मणि मल्लिक – (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – देखो, प्रदर्शनी में कितनी बड़ी बिजली की बत्ती लगायी है। उस बत्ती को देखकर हमें लगता है वे (भगवान्) कितने बड़े हैं, जिन्होंने बिजली की बत्ती बनायी है।

श्रीरामकृष्ण – (मणिलाल के प्रति) – एक और मत है, वे ही ये सब कुछ बने हुए हैं। फिर जो कह रहा है वह भी वे ही हैं। ईश्वर, माया, जीव, जगत्।

म्युजियम की चर्चा चली।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – मैं एक बार म्युजियम में गया था। वहाँ मुझे फासिल* दिखाये गये। मैंने देखा कि लकड़ी पत्थर बन गयी है, पूरा जानवर पत्थर बन गया है। देखा, – संग का क्या गुण है! इसी प्रकार सदा सज्जन का संग करने से वही बन जाता है।

मणि मल्लिक – (हँसकर) – महाराज, यदि आप एक बार प्रदर्शनी में जाते तो शायद हमें १०-१५ वर्ष तक उपदेश देने की सामग्री आपको मिल जाती।

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – क्या उपमा के लिए?

बलराम – नहीं, वहाँ जाना ठीक नहीं। इधर-उधर जाने से हाथ को आराम नहीं मिलेगा।

श्रीरामकृष्ण – मेरी इच्छा है कि मुझे दो चित्र मिलें। एक चित्र, योगी धुनी जलाकर


* फासिल (Fossil) – करोड़ो वर्ष पूर्व की लकड़ी, पत्ते, फल, यहाँ तक कि फूल भी हमें आज पत्थर के रूप में प्राप्त हैं, इन्हें ‘फासिल’ कहते हैं।