श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context४५६ श्रीरामकृष्णवचनामृत ९ मार्च, १८८४
हँसते हैं।)
सुरेन्द्र – जयगोपाल बाबू ब्राह्म-समाजी हैं। मेरी समझ में शायद केशव के सम्प्रदाय में अब कोई भी ढंग का आदमी नहीं रह गया है। विजय गोस्वामी, शिवनाथ तथा अन्य बाबुओं ने मिलकर साधारण ब्राह्मसमाज की स्थापना की है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – गोविन्द अधिकारी अपनी नाटकमण्डली में अच्छा आदमी न रखता था – हिस्सा देने का भय जो था। (सब हँसते है।)
“उस दिन केशव के एक शिष्य को मैंने देखा था। केशव के मकान में अभिनय हो रहा था। देखा, वह लड़के को गोद में लेकर नाच रहा है। फिर सुना, व्याख्यान भी देता है। खुद को कौन शिक्षा दे, इसका पता नहीं।”
त्रैलोक्य गाने लगे। गाना जब समाप्त हो गया तब श्रीरामकृष्ण ने उनसे ‘आमाय दे माँ पागल करे’ गाने के लिए कहा।
(२)
रविवार, ९ मार्च १८८४ ई.। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में मणिलाल मल्लिक, सींती के महेन्द्र कविराज, बलराम, मास्टर, भवनाथ, राखाल, लाटू, अधर, महिमाचरण, हरीश, किशोरी (गुप्त), शिवचन्द्र आदि अनेक भक्तों के साथ बैठे हैं। अभी तक गिरीश, काली, सुबोध आदि नहीं आये हैं। शरत् तथा शशी ने केवल एक-दो बार ही दर्शन किया है। पूर्ण, छोटे नरेन आदि ने भी अभी तक उन्हें नहीं देखा है।
श्रीरामकृष्ण के हाथ में बैण्डेज बँधा हुआ है। रेलिंग के किनारे गिरकर हाथ टूट गया है – उस समय भाव में विभोर हो गये थे। हाल ही में हाथ टूटा है – निरन्तर पीड़ा बनी रहती है।
परन्तु इस स्थिति में भी वे प्रायः समाधिमग्न रहते हैं और भक्तों के साथ गम्भीर तत्त्वों की बातें करते हैं।
एक दिन कष्ट से रो रहे हैं, उसी समय समाधिमग्न हो गये। समाधिभंग होने के बाद महिमाचरण आदि भक्तों से कह रहे हैं, “भाई, सच्चिदानन्द की प्राप्ति न हुई तो कुछ भी न हुआ। व्याकुल हुए बिना कुछ न होगा। मैं रो-रोकर पुकारता था और कहता था, ‘हे दीनानाथ, मेरा साधन-भजन कुछ भी नहीं है, पर मुझे दर्शन देना होगा।’”
उसी दिन रात को फिर महिमाचरण, अधर, मास्टर आदि बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महिमाचरण के प्रति) – एक प्रकार है – अहेतुकी भक्ति, इसे यदि प्राप्त कर सको!
फिर अधर से कह रहे हैं – “इस हाथ पर जरा हाथ फेर सकते हो?”
मणिलाल मल्लिक तथा भवनाथ प्रदर्शनी की बातें कर रहे हैं जो १८८३-८४ ई.