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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 478 of 711

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Page 478
२ मार्च १८८४परिच्छेद ७७४५५

लूले को कुछ देने से ठीक भी है।' तब हृदय ने कहा, 'महाशय, बस यह बात न कहियेगा। मुझे रुपयों की जरूरत नहीं। ईश्वर करें, मुझे अन्धा-लँगड़ा-लूला या दरिद्र न होना पड़े। न अब आपके देने का काम है और न मेरे लेने का।'

ईश्वर नरेन्द्र पर अब भी दया नहीं करते, इस पर मानो अभिमान करके श्रीरामकृष्ण ने यह बात कही। श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र की ओर स्नेह की दृष्टि से देख रहे हैं।

नरेन्द्र – मैं ‘नास्तिकवाद’ पढ़ रहा हूँ।

श्रीरामकृष्ण – दो हैं – ‘अस्ति’ और ‘नास्ति’। ‘अस्ति को ही क्यों नहीं लेते?’

सुरेन्द्र – ईश्वर तो बड़े न्यायी हैं, वे क्या भक्त की देखभाल न करेंगे?

श्रीरामकृष्ण – शास्त्रों में है, पूर्वजन्म में जो लोग दान आदि करते हैं, उन्हीं को धन मिलता है; परन्तु बात यह है कि संसार उनकी माया है, माया के राज्य में बड़ा गोलमाल है, कुछ समझ में नहीं आता।

“ईश्वर का काम कुछ समझा नहीं जाता। भीष्मदेव शरशय्या पर लेटे हुए थे। पाण्डव उन्हें देखने गये। साथ में श्रीकृष्ण भी थे। आये तो थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा, भीष्म रो रहे थे। पाण्डवों ने श्रीकृष्ण से कहा, 'कृष्ण, यह बड़े आश्चर्य की बात है! पितामह अष्ट वसुओ में एक हैं, उनकी तरह ज्ञानी देखने में नहीं आते, परन्तु ये भी मृत्यु के समय माया में पड़कर रो रहे हैं!' श्रीकृष्ण ने कहा, 'भीष्म इसलिए नहीं रो रहे हैं। इसका कारण उन्हीं से पूछो।' पूछने पर भीष्म ने कहा, 'कृष्ण, ईश्वर के कार्य कुछ समझ न सका। मैं इसलिए रो रहा हूँ कि जिनके साथ साथ साक्षात् नारायण घूम रहे हैं उन पाण्डवों की भी विपत्ति का अन्त नहीं होता! यह बात जब मैं सोचता हूँ तब यही निश्चय होता है कि उनके कार्य का कुछ भी अंश समझ में नहीं आ सकता।'

“मुझे उन्होंने दिखलाया था, जिन्हें वेदों में शुद्धात्मा कहा है, एक वही परमात्मा अटल सुमेरुवत् निर्लिप्त तथा सुख और दुःख से अलग हैं। उनकी माया के कार्यों में बड़ी जटिलता है। किसके बाद क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।”

सुरेन्द्र – (सहास्य) – और पूर्वजन्म में कुछ दान आदि करने से इस जन्म में धन प्राप्त होता है, तो हमें दान आदि करना चाहिए।

श्रीरामकृष्ण – जिसके पास धन है, उसे दान करना चाहिए। (त्रैलोक्य से) जयगोपाल सेन के धन है, उसे दान करना चाहिए। वह नहीं करता, यह उसके लिए निन्दा की बात है। धन के रहने पर भी कोई कोई बड़े हिसाबी होते हैं – परन्तु इसका क्या ठिकाना कि वह धन किसके हिस्से में पड़ जायगा।

“अभी उस दिन जयगोपाल आया था। गाड़ी पर आया करता है। गाड़ी में फूटी लालटेन और घोड़े मरघट से लौटे हुए – दरवान मेडिकल कालेज के अस्पताल का वापस आया हुआ मरीज – और यहाँ के लिए ले आता है दो सड़े अनार!” (सब