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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 473 of 711

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Page 473

परिच्छेद ७७

गृहस्थ तथा संन्यासियों के नियम

(१)

दक्षिणेश्वर मन्दिर में नरेन्द्र आदि भक्तों के साथ

“श्रीरामकृष्ण काली-मन्दिर में, अपनी उसी छोटी खाट पर बैठे हुए गाना सुन रहे हैं। ब्राह्मसमाज के श्री त्रैलोक्य सान्याल गा रहे हैं। आज रविवार है, २ मार्च १८८४। जमीन पर भक्तगण बैठे हुए गाना सुन रहे हैं। – नरेन्द्र, सुरेन्द्र मित्र, मास्टर, त्रैलोक्य आदि कितने ही भक्त बैठे हैं।

श्रीयुत नरेन्द्र के पिता-बड़ी अदालत के वकील थे। उनका देहान्त हो जाने पर उनके परिवार को इस समय बड़ी तकलीफ है, यहाँ तक कि कभी-कभी फाका भी करना पड़ता है।

श्रीरामकृष्ण का शरीर, जब से हाथ टूटा, अब तक अच्छा नहीं हुआ। हाथ में बहुत दिनों तक तख्ती बँधी थी।

त्रैलोक्य माता का संगीत गा रहे हैं। गाते हुए, कह रहे हैं, माँ, अपनी गोदी में लेकर, आँचल से ढककर मुझे अपनी छाती से लगा रखो।

(संगीत का भाव)

“माँ, मैं तेरे हृदय में छिपा रहूँगा। तेरे मुँह की ओर ताकताककर, माँ-माँ कहकर पुकारूँगा। चिदानन्द-रस में डूबकर महायोग की निद्रा के आवेश में निर्निमेष नयनों से, तेरी दृष्टि पर दृष्टि जमाये हुए, तेरा रूप देखूँ। संसार का तमाशा देखकर और सुनकर भय से हृदय काँप उठता है। मुझे अपने स्नेह के आँचल से ढककर तुम हृदय से लगा लो, फिर कभी अलग न करना।”

गाना सुनते हुए श्रीरामकृष्ण की आँखों से प्रेम के आँसू टपक रहे हैं। भाव में गद्गद कण्ठ से कह रहे हैं – अहा! कैसा भाव है!

त्रैलोक्य फिर गा रहे हैं – (भाव)

(१) “हरे! तुम अपने भक्तों की लाज रखनेवाले हो। तुम मेरी मनोकामना पूर्ण करो। ऐ ईश्वर! तुम भक्तों के सम्मान हो। बिना तुम्हारे और कौन रक्षा कर सकता है?