श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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DevanagariHindipublished711 pages
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| २४ फरवरी १८८४ | परिच्छेद ७६ | ४४९ |
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“रामलाल की माँ को डाटने के लिए गया तो सही, पर फिर हो न सका। देखा उन्हीं का एक रूप है। माँ को कुमारी के भीतर देखता हूँ, इसलिए कुमारी-पूजन करता हूँ।
“मेरी स्त्री पैरों पर हाथ फेरती है, फिर मैं उसे नमस्कार करता हूँ।
“तुम लोग मेरे पैर छूकर नमस्कार करते हो, – हृदय अगर रहता तो किसकी मजाल थी, जो पैरों में हाथ लगाता! – वह किसी को पैर छूने ही न देता!
“इस अवस्था में रखा है, इसीलिए नमस्कार के बदले नमस्कार करना पड़ता है।
“देखो, दुष्ट आदमी तक को अलग करने की जगह नहीं है। तुलसी सूखी हो, छोटी हो, श्रीठाकुरजी की सेवा में लग ही जाती है।”
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