श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| २ मार्च १८८४ | परिच्छेद ७७ | ४५१ |
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प्राणपति, प्राणाधार तुम्हीं हो। मैं तो तुम्हारा गुलाम हूँ।”
(२) “तुम्हारे चरणों को सार समझकर, जाति-पाँति का विचार छोड़ लाज और भय को भी मैंने तिलांजलि दे दी। अब रास्ते का बटोही होकर मैं कहाँ जाऊँ? अब तो तुम्हारे लिए मैं कलंक-भागी हो चुका; तुम्हें मैं प्यार करता हूँ, इसलिए लोग मेरी कितनी निन्दा करते हैं। अब मेरी शर्म और भ्रम सब तुम्हारा ही है। चाहे तुम मेरी रक्षा करो और चाहे न करो, उत्तरदायित्व और भार तुम्हीं पर है। परन्तु यह सोच लेना कि दास का मान तुम्हारा ही मान है। तुम मेरे हृदय के स्वामी हो, तुम्हारे ही मान से मेरा भी मान है, अतएव जैसी तुम्हारी रुचि हो, वही करो।”
(३) “घर से बाहर निकालकर अगर तुमने मुझे अपने प्रेम में फँसाया है तो मुझे अपने श्रीचरणों में जगह भी तो दो। ऐ प्राणप्यारे, सदा ही मुझे अपना प्रेममधु पिलाते रहो। जो तुम्हारे प्रेम का दास है, उसका परित्राण करो।”
श्रीरामकृष्ण की आँखों से प्रेम की धारा बह रही है। वे जमीन पर आकर बैठे और रामप्रसाद के भावों में गाने लगे –
“यश, अपयश, कुरस, सुरस सब तुम्हारे ही रस हैं। माँ, रसेश्वरि! रस में रहकर रसभंग क्यों करती हो?”
त्रैलोक्य से कह रहे हैं – ‘अहा! तुम्हारे गाने कैसे हैं! तुम्हारे गाने बहुत ठीक हैं। केवल वही जो समुद्र को गया है, वहाँ का जल ला सकता है।’ त्रैलोक्य फिर गाते हैं –
“हरि, तुम्हीं नाचते हो, तुम्हीं गाते हो और तुम्हीं ताल ताल पर हथेली बजाते हो। मनुष्य तो एक पुतला मात्र है, वृथा ही वह ‘मेरा मेरा’ कहता है। जैसे कठपुतली के खिलौने हैं, वैसा ही जीवों का जीवन भी है। मनुष्य यदि तुम्हारे रास्ते पर चलता है, तो वह देवता बन जाता है। देहयन्त्र में यन्त्रीस्वरूप तुम्हीं हो, आत्म-रथ में तुम्हीं रथी हो, जीव तो अपनी स्वाधीनता के फल से केवल पापों का भोग करता है। तुम सब के मूलाधार हो, तुम प्राणों के प्राण और हृदय के स्वामी हो, तुम अपने पुण्य के बल से असाधु को भी साधु बना देते हो।” गाना समाप्त हुआ। श्रीरामकृष्ण अब बातचीत कर रहे हैं।
नित्यलीला योग। पूर्ण ज्ञान अथवा विज्ञान
श्रीरामकृष्ण – (त्रैलोक्य और दूसरे भक्तों से) – हरि ही सेव्य हैं और हरि ही सेवक हैं – यह भाव पूर्ण ज्ञान का लक्षण है। पहले नेति-नेति करने पर, ईश्वर ही सत्य हैं और सब मिथ्या है, यह बोध होता है। इसके बाद वह देखता है, ईश्वर ही सब कुछ हुए हैं – ईश्वर ही माया, जीव, जगत्, यह सब हुए हैं। अनुलोम हो जाने पर फिर विलोम होता है। यह पुराणों का मत है। जैसे एक बेल में गूदा, बीज और खोपड़ा है। खोपड़ा और बीज निकाल देने पर गूदा रह जाता है; परन्तु बेल का वजन कितना था, यह जानने की