श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२ फरवरी १८८४ | परिच्छेद ७५ | ४४३
“यस्यामिदं कल्पितमिन्द्रजालं।
चराचरं भाति मनोविलासम्॥
सच्चित्सुखैकं जगदात्मरूपं।
सा काशिकाहं निजबोधरूपः॥”
‘सा काशिकाहं निजबोधरूपः’ यह सुनते ही श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कह रहे हैं – जो कुछ भाण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है।
अब पाठ हो रहा है निर्वाणषट्कम् से –
“ॐ मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं,
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायु,
श्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥”
जितनी बार महिमाचरण कह रहे हैं – ‘चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्’, उतनी ही बार श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – नाहं, नाहं – तुम, तुम – चिदानन्द हो।
महिमाचरण जीवन्मुक्ति-गीता से कुछ श्लोक पढ़कर षट्चक्रवर्णन पढ़ रहे हैं। उन्होंने स्वयं काशी में योगी की योगावस्था में मृत्यु देखी थी, यह बात उन्होंने कही।
अब वे भूचरी और खेचरी मुद्रा का वर्णन कर रहे हैं। साथ ही शाम्भवी विद्या का भी। शाम्भवी यह कि मनुष्य जहाँ-तहाँ जाया करता है, उसका कोई उद्देश्य नहीं है।
महिमा – राम-गीता में बड़ी अच्छी अच्छी बातें हैं।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – तुम राम-गीता, राम-गीता कर रहे हो, तो तुम घोर वेदान्ती हो! साधु महात्मा यहाँ कितना पढ़ते थे।
महिमाचरण, प्रणव शब्द कैसा है, यही पढ़ रहे हैं – ‘तैलधारमविच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत्।’ फिर समाधि के लक्षण कह रहे हैं –
“ऊर्ध्वपूर्ण अधःपूर्ण मध्यपूर्ण यदात्मकम्।
सर्वपूर्ण स आत्मेति समाधिस्थस्य लक्षणम्॥”
अधर और महिमाचरण प्रणाम करके बिदा हुए।
(६)
श्रीरामकृष्ण की बालक जैसी अवस्था
दूसरे दिन रविवार है, ३ फरवरी १८८४। दोपहर के भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए हैं। कलकत्ते से राम, सुरेन्द्र आदि भक्त उनके चोट लगने का हाल पाकर चिन्तित हो, आये हैं। मास्टर भी पास बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण के हाथ में लकड़ी