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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 467 of 711

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Page 467
४४४श्रीरामकृष्णवचनामृत२ फरवरी, १८८४

बँधी हुई है। भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण - (भक्तों से) - ऐसी अवस्था में माँ ने रखा है कि छिपाने की मजाल नहीं, बालक जैसी अवस्था।

"राखाल मेरी अवस्था नहीं समझता। कहीं कोई देखकर निन्दा न करे, इसलिए टूटे हाथ को कपड़े से छिपा देता है। मधु डाक्टर को अलग ले जाकर सब बातें कह रहा था। तब चिल्लाकर मैंने कहा, कहाँ हो मधूसूदन, देखो आकर मेरा हाथ टूट गया है।

"मथुर बाबू और उनकी पत्नी जिस घर में सोते थे, उसी में मैं भी सोता था। वे ठीक बच्चे के समान मेरी देखभाल करते थे। तब मेरी उन्माद-अवस्था थी। मथुर बाबू कहते थे, 'बाबा, क्या हम लोगों की कोई बातचीत तुम्हारे कान तक पहुँचती है?' मैं कहता था, 'हाँ पहुँचती है।'

"मथुर बाबू की पत्नी ने उन पर (मथुर बाबू पर) सन्देह करके कहा था, 'अगर कहीं जाना तो भट्टाचार्य महाशय को साथ ले जाना।' वे एक जगह गये, मुझे मकान में नीचे बैठा दिया। फिर आध घण्टे बाद आकर कहा, 'चलो बाबा, चलें, गाड़ी पर बैठो चलकर।' घर आकर उनकी पत्नी ने पूछा तो मैंने ठीक यही सब बातें सुना दीं। मैंने कहा, 'सुनो, एक मकान में हम लोग गये थे, उन्होंने मुझे नीचे बैठा दिया था, आप ऊपर गये थे, आध घण्टे के बाद आकर कहा, चलो बाबा, चलें!' उनकी पत्नी ने, इससे जो कुछ समझना था, समझ लिया।

"मथुर का एक हिस्सेदार यहाँ के पेड़ों के फल और गोभियाँ गाड़ी में लादकर घर भेज देता था। दूसरे हिस्सेदारों ने जब पूछा, तब मैंने यही बात बता दी।"

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