Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 465 of 711

Read in context
Page 465

४४२ श्रीरामकॄष्णवचनामृत २ फरवरी, १८८४

(५)

स्तवपाठ

बातचीत में रात के आठ बज गये। श्रीरामकृष्ण महिमाचरण को शास्त्रों से कुछ स्तव आदि सुनाने के लिए कह रहे हैं। महिमाचरण एक पुस्तक लेकर उत्तरगीता के आरम्भ में ही परब्रह्म सम्बन्धी जो श्लोक हैं वही सुनाने लगे – ‘यदेकं निष्कलं ब्रह्म व्योमातीतं निरंजनम्। अप्रतर्क्यमविज्ञेयं विनाशोत्पत्तिवर्जितम्।’

फिर तृतीय अध्याय का सातवाँ श्लोक पढ़ते हैं – ‘अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्। प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्।’ अर्थात् ब्राह्मणों के देवता अग्नि हैं, मुनियों के देवता हृदय में हैं, स्वल्पबुद्धि मनुष्यों के लिए प्रतिमा ही देवता हैं और समदर्शी महायोगियों के लिए देवता सर्वत्र हैं।

‘सर्वत्र समदर्शिनाम्’ – इस अंश का उच्चारण होते ही श्रीरामकृष्ण एकाएक आसन छोड़कर खड़े हो गये और समाधिमग्न हो गये। हाथ में वही लकड़ी और बैण्डेज बँधा हुआ है। भक्तगण चुपचाप इस सर्वदर्शी महायोगी की अवस्था देख रहे हैं।

बड़ी देर तक इस तरह खड़े रहने के बाद श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ हुए। फिर उन्होंने आसन ग्रहण किया। महिमाचरण को अब हरिभक्तिवाले श्लोक पढ़ने के लिए कह रहे हैं।

महिमाचरण – (‘नारदपंचरात्र’ से) –

“अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्।
नान्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्॥
आराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्।
नाराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्॥
विरम विरम ब्रह्मन् किं तपस्यासु वत्स।
व्रज व्रज द्विज शीघ्रं शङ्करं ज्ञानसिन्धुम्॥
लभ लभ हरिभक्तिं वैष्णवोक्तां सुपक्वाम्।
भवनिगडनिबन्धच्छेदनीं कर्तरीं च॥”

श्रीरामकृष्ण – अहा! अहा!

भाण्ड और ब्रह्माण्ड। तुम ही चिदानन्द, नाहं, नाहं

श्लोकों को सुनकर श्रीरामकृष्ण फिर भावावेश में आने लगे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने भाव रोका। अब यतिपंचक का पाठ हो रहा है –