श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 464 of 711
Read in context२ फरवरी १८८४ परिच्छेद ७५ ४४१
“इसीलिए तो मारवाड़ी ने जब हृदय के पास रुपये जमा करने की इच्छा प्रकट की, तब मैंने कहा, 'यह बात न होगी, रुपये पास रहने से ही बादल उठेंगे।'
“संन्यासी के लिए ऐसा कठोर नियम क्यों है? उसके मंगल के लिए भी है और लोगों की शिक्षा के लिए भी। संन्यासी यद्यपि स्वयं निर्लिप्त हो – जितेन्द्रिय हो, तथापि लोगों को शिक्षा देने के लिए उसे कामिनी-कांचन का इस तरह त्याग करना चाहिए।
“संन्यासी का सोलहों आना त्याग देखकर ही दूसरे लोगों को साहस होगा। तभी वे कामिनी-कांचन छोड़ने की चेष्टा करेंगे।
“त्याग की यह शिक्षा यदि संन्यासी न देगा तो कौन देगा?
“उन्हें प्राप्त कर लेने पर फिर संसार में रहा जा सकता है। जैसे मक्खन उठाकर पानी में डाल रखना। जनक ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर संसार में रहे थे।
“जनक दो तलवारें चलाते थे – ज्ञान की और कर्म की। संन्यासी कर्मों का त्याग करता है। इसलिए उसके पास एक ही तलवार है – ज्ञान की। जनक की तरह का ज्ञानी संसार-पेड़ के नीचे का फल भी खा सकता है और ऊपर का भी। साधु-सेवा, अतिथि-सत्कार, ये सब कर सकता है। मैंने माँ से कहा था, 'माँ, मैं सूखा साधु न होऊँगा।'
“ब्रह्मज्ञान-लाभ के पश्चात् खानपान का भी विचार नहीं रहता। ब्रह्मज्ञानी ऋषि ब्रह्मानन्द के बाद कुछ भी खा सकते थे – शूकरमांस तक।
चार आश्रम, योगतत्त्व और श्रीरामकृष्ण
(महिमाचरण से) “संक्षेप में योग दो प्रकार के हैं, कर्मों के द्वारा योग और मन के द्वारा योग।
“ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास – इनमें से प्रथम तीनों में कर्म करना पड़ता हैं। संन्यासी को दण्ड-कमण्डल और भिक्षापात्र लेने पड़ते हैं। संन्यासी चाहे कभी कभी नित्यकर्म कर ले, परन्तु उसके मन में कभी आसक्ति नहीं होती। उसे उन कर्मों का ज्ञान नहीं रहता। कोई कोई संन्यासी कुछ कुछ नित्यकर्म करते हैं, परन्तु वह होता है लोकशिक्षा के लिए। गृहस्थ अथवा दूसरे आदमी यदि निष्काम कर्म कर सकें तो उन कर्मों के द्वारा उनका ईश्वर से योग हो जाता है।
“परमहंस अवस्था में – जैसी शुकदेव आदि की थी – कर्म सब छूट जाते हैं; पूजा, जप, तर्पण, सन्ध्या, ये सब कर्म। इस अवस्था में केवल मन का योग होता है। बाहर के काम कभी कभी वह इच्छापूर्वक करता है – लोकशिक्षा के लिए। परन्तु वह सदा ही स्मरण और मनन किया करता है।”