श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| ४०४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २४ दिसम्बर, १८८३ |
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हैं। बहुत ज्यादा अच्छा नहीं।” श्रीरामकृष्ण ने अपने कमरे में पहुँचकर आसन ग्रहण किया।
(२)
प्रेमाभक्ति और श्रीवृन्दावनलीला। अवतार तथा नरलीला
भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं। बड़े दिन की छुट्टी लग गयी है। कलकत्ते से सुरेन्द्र, राम आदि भक्तगण धीरे धीरे आ रहे हैं।
दिन के एक बजे का समय होगा। मणि अकेले झाऊतल्ले में टहल रहे हैं। इसी समय रेलिंग के पास खड़े होकर हरीश उच्च स्वर से मणि को पुकारकर कह रहे हैं – “आपको बुलाते हैं, शिव संहिता पढ़ी जाए।”
शिवसंहिता में योग की बातें हैं – षट्चक्रों की बात है।
मणि श्रीरामकृष्ण के कमरे में आकर प्रणाम करके बैठे। श्रीरामकृष्ण छोटे तख्त पर तथा भक्तगण जमीन पर बैठे हुए हैं। इस समय शिवसंहिता का पाठ नहीं हुआ। श्रीरामकृष्ण स्वयं ही बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – गोपियों की प्रेमाभक्ति थी। प्रेमाभक्ति में दो बातें रहती हैं। – 'अहंता' और 'ममता'। यदि मैं श्रीकृष्ण की सेवा न करूँ तो उनकी तबीयत बिगड़ जाएगी – यह अहंता है। इसमें ईश्वरबोध नहीं रहता।
“ममता है 'मेरा मेरा' करना। गोपियों की ममता इतनी बढ़ी हुई थी कि कहीं पैरों में जरासी चोट न लग जाय, इसलिए उनका सूक्ष्मशरीर श्रीकृष्ण के श्रीचरणों के नीचे रहता था।
“यशोदा ने कहा, 'तुम्हारे चिन्तामणि श्रीकृष्ण को मैं नहीं जानती। – मेरा तो वह गोपाल ही है।' उधर गोपियाँ भी कहती हैं, 'कहाँ हैं मेरे प्राणवल्लभ – हृदयवल्लभ' ईश्वरबोध उनमें नहीं था।
“जैसे छोटे छोटे लड़के, मैंने देखा है, कहते हैं, 'मेरे बाबा'। यदि कोई कहता है, 'नहीं, तेरे बाबा नहीं हैं' तो वे कहते हैं, 'क्यों नहीं – मेरे बाबा तो हैं।'
“नरलीला करते समय अवतारी पुरुषों को ठीक आदमी की तरह आचरण करना पड़ता है, – इसीलिए उन्हें पहचानना मुश्किल हो जाता है। नररूप धारण किया है तो प्राकृत नरों की तरह ही आचरण करेंगे। वही भूख-प्यास, रोग-शोक, वही भय – सब प्राकृत मनुष्यों की तरह। श्रीरामचन्द्र सीताजी के वियोग में रोए थे। गोपाल ने नन्द की जूतियाँ सिर पर ढोयी थीं – पीढ़ा ढोया था।
“थियेटर में साधु बनते हैं तो साधुओं का-सा ही व्यवहार करते हैं – जो राजा बनता है, उसकी तरह व्यवहार नहीं करते। जो कुछ बनते हैं वैसा ही अभिनय भी करते हैं।