श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२४ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६९ | ४०५
“कोई बहुरूपिया साधु बना था, - त्यागी साधु। स्वाँग उसने ठीक बनाकर दिखलाया था, इसलिए बाबुओं ने उसे एक रुपया देना चाहा। उसने न लिया, 'ऊँहूँ' कहकर चला गया। देह और हाथ-पैर धोकर अपने सहज स्वरूप में जब आया तब उसने रुपया माँगा। बाबुओं ने कहा, 'अभी तो तुमने कहा, रुपया न लेंगे और चले गए, अब रुपया लेने कैसे आए?' उसने कहा, 'तब मैं साधु बना हुआ था, उस समय रुपया कैसे ले सकता था!'
“इसी तरह ईश्वर जब मनुष्य बनते हैं, तब ठीक मनुष्य की तरह व्यवहार करते हैं।
“वृन्दावन जाने पर कितने ही लीला के स्थान दीख पड़ते हैं।”
सुरेन्द्र – हम लोग छुट्टी में गए थे। वहाँ माँगते इतने हैं कि 'पैसा दीजिए', 'पैसा दीजिए' की रट लगा देते हैं। 'दीजिए' 'दीजिए' करने लगे – पण्डे भी और दूसरे भी। उनसे मैंने कहा, हम कल कलकत्ता जाएंगे; यह कहकर उसी दिन वहाँ से नौ-दो-ग्यारह!
श्रीरामकृष्ण – यह क्या है? कल जाएँगे कहकर आज ही भागना! छिः!
सुरेन्द्र (लज्जित होकर) – उन लोगों में भी कहीं कहीं साधुओं को देखा था। निर्जन में बैठे हुए साधन-भजन कर रहे थे।
श्रीरामकृष्ण – साधुओं को कुछ दिया?
सुरेन्द्र – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – यह अच्छा काम नहीं किया। साधु-भक्तों को कुछ दिया जाता है। जिनके पास धन है, उन्हें उस तरह के आदमी को सामने पड़ने पर कुछ देना चाहिए।
“मैं भी वृन्दावन गया था, मथुरबाबू के साथ। ज्योंही मथुरा का ध्रुवघाट मैंने देखा कि उसी समय दर्शन हुआ, वसुदेव श्रीकृष्ण को गोद में लेकर यमुना पार कर रहे हैं।
“फिर शाम को यमुना के तट पर टहल रहा था। बालू पर छोटे छोटे झोपड़े थे, बेर के पेड़ बहुत थे। गोधूलि का समय था, गौएँ चरागाह से लौट रही थीं। देखा, उतरकर यमुना पार कर रही हैं। इसके बाद कुछ चरवाहे गौओं को लेकर पार होने लगे। ज्योंही यह देखा कि 'कृष्ण कहाँ है?' कहकर बेहोश हो गया।
“श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड के दर्शन करने की इच्छा हुई थी। पालकी पर मुझे मथुरबाबू ने भेज दिया। रास्ता बहुत दूर है। पालकी के भीतर पूड़ियाँ और जलेबियाँ रख दी गयी थीं। मैदान पार करते समय यह सोचकर रोने लगा, 'वे सब स्थान तो हैं, पर कृष्ण, तू ही नहीं है! - यह वही भूमि है जहाँ तू गौएँ चराता था।
“हृदय रास्ते में साथ साथ पीछे आ रहा था। मेरी आँखों से आँसुओ की धारा बह रही थी। कहारों को खड़े होने के लिए भी न कह सका।
“श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड में जाकर देखा, साधुओं ने एक एक झोपड़ी-सी बना रखी है, - उसी के भीतर पीठ फेरकर साधन-भजन कर रहे हैं। पीठ इसलिए फेर बैठे हैं