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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 426 of 711

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Page 426

२४ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६९ | ४०३

“नागे ने बाघ और बकरी की कहानी कही थी। एक बाघिन बकरियों के झुण्ड पर टूट पड़ी। किसी बहेलिये ने दूर से उसे देखकर मार डाला। उसके पेट में बच्चा था, वह पैदा हो गया। वह बच्चा बकरियों के बीच में बढ़ने लगा। पहले बच्चा बकरियों का दूध पीता था। इसके बाद जब कुछ बड़ा हुआ तब घास चरने लगा और बकरियों की तरह 'में में' करने लगा। धीरे धीरे वह बहुत बड़ा हो गया पर तब भी वह घास ही चरता और 'में में' करता। कोई जानवर जब आक्रमण करता, तब बकरों की तरह डरकर भागता! एक दिन एक भयंकर बाघ बकरियों पर टूट पड़ा। उसने आश्चर्य में आकर देखा, उनमें एक बाघ भी घास चर रहा है और उसे देखकर बकरियों के साथ साथ वह भी दौड़कर भागा। तब बकरियों से कुछ छेड़छाड़ न करके घास चरनेवाले उस बाघ को ही उसने पकड़ा। वह 'में में' करने लगा और भागने की कोशिश करता गया। तब बाघ उसे पानी के किनारे खींचकर ले गया और उससे कहा, 'इस पानी में अपना मुँह देख। हण्डी की तरह मेरा मुँह जितना बड़ा है, उतना ही बड़ा तेरा भी है।' फिर उसके मुँह में थोड़ासा माँस खोंस दिया। पहले वह किसी तरह खाता ही न था, फिर कुछ स्वाद पाकर खाने लगा। तब बाघ ने कहा, 'तू बकरियों के बीच में था और उन्हीं की तरह घास खाता था! धिक्कार है तुझे' तब उसे बड़ी लज्जा हुई।

“घास खाना है कामिनी-कांचन लेकर रहना। बकरियों की तरह 'में में' करना और भागना है – सामान्य जीवों की तरह आचरण करना। बाघ के साथ जाना है – गुरु, जिन्होंने ज्ञान की आँखें खोल दीं, उनकी शरणागत होना, उन्हें ही आत्मीय समझना। अपना सच्चा मुँह देखना है – अपने स्वरूप को पहचानना।”

श्रीरामकृष्ण खड़े हो गए। चारों ओर सन्नाटा है। सिर्फ झाऊ के पेड़ों की सनसनाहट और गंगाजी की कलकल-ध्वनि सुन पड़ रही है। वे रेलिंग पार करके पंचवटी के भीतर से अपने कमरे की ओर मणि से बातचीत करते हुए जा रहे हैं। मणि मन्त्रमुग्ध की तरह पीछे पीछे जा रहे हैं।

पंचवटी में आकर, जहाँ उसकी एक डाल टूटी पड़ी है, वहीं खड़े होकर, पूर्वास्य हो, बरगद के मूल पर बँधे हुए चबूतरे पर सिर टेककर प्रणाम किया। यह स्थान उनकी साधना का स्थान है। यहाँ पर उन्होंने व्याकुल होकर कितना क्रन्दन किया है कितने ही ईश्वरी रूपों के दर्शन किए हैं, और माता के साथ कितनी बातें की हैं! क्या इसीलिए जब वे यहाँ आते हैं तो प्रणाम करते हैं?”

बकुलतल्ला होकर वे नौबतखाने के निकट आए। मणि साथ ही हैं।

नौबतखाने के पास आकर हाजरा को देखा। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “अधिक न खाते जाना और बाह्य शुद्धि की ओर इतना ध्यान देना छोड़ दो। जिन्हें बेकार यह धुन सवार रहती है उन्हें ज्ञान नहीं होता। आचार उतना ही चाहिए जितने की जरूरत