श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२२ सितम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५३ | ३०३
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) - देखा! इसी बालक की तरह विश्वास चाहिए।* तब होता है। (ईशान के प्रति) और वह कर्मत्याग की कहानी सुनाओ तो।
ईशान - भगवान् की प्राप्ति होने पर सन्ध्या आदि कर्मों का त्याग हो जाता है। गंगा के तट पर सभी सन्ध्योपासना कर रहे हैं, एक व्यक्ति नहीं कर रहा है। उससे पूछने पर उसने कहा "मुझे अशौच हुआ है, सन्ध्योपासना करने की मनाई है। मृताशौच तथा जन्माशौच, दोनों ही हुए हैं। अविद्यारूपी माता की मृत्यु हुई है और आत्माराम का जन्म हुआ है।"†
श्रीरामकृष्ण - अच्छा वह कहानी सुनाना, - जिसमें कहा है कि आत्मज्ञान होने पर जातिभेद नहीं रह जाता।
ईशान - वाराणसी में गंगास्नान करके शंकराचार्य घाट की सीढ़ी पर चढ़ रहे थे - उस समय कुत्ते पालनेवाले एक चाण्डाल को सामने बिलकुल पास ही देखकर बोले, "यह क्या, तूने मुझे छू लिया!" चाण्डाल बोला, "महाराज, तुमने भी मुझे नहीं छुआ और मैंने भी तुम्हें नहीं छुआ। आत्मा सभी के अन्तर्यामी और निर्लिप्त हैं। शराब में पड़ा हुआ सूर्य का प्रतिबिम्ब और गंगाजल में पड़ा हुआ सूर्य का प्रतिबिम्ब, क्या इन दोनों में भेद है?
श्रीरामकृष्ण (हँसकर) - और वह समन्वय की कथा कैसी है? सभी मतों से उन्हें प्राप्त किया जा सकता है।
ईशान (हँसकर) - हरि और हर में एक ही धातु 'हृ' है। केवल प्रत्यय का भेद है। जो हरि हैं, वही हर हैं। विश्वास भर रहना चाहिए।
श्रीरामकृष्ण (हँसकर) अच्छा वह कहानी - साधु का हृदय सब से बड़ा है।
ईशान (हँसकर) - सब से बड़ी है पृथ्वी, उससे बड़ा है समुद्र, उससे बड़ा है आकाश। परन्तु भगवान् विष्णु ने एक पैर से स्वर्ग, मर्त्य, पाताल - त्रिभुवन पर अधिकार कर लिया था। पर उस विष्णु का पद साधु के हृदय में है! इसलिए साधु का हृदय सब से बड़ा है।
इन सब बातों को सुनकर भक्तगण आनन्दित हो रहे हैं।
* "The kingdom of heaven is revealed unto babes but is hidden from the wise and the pruden." – Bible
† मृता मोहमयी माता जातो बोधमयः सुतः। सूतकद्वयसम्प्रातौ कथं सन्ध्यामुपास्महे॥
हृदाकाशे चिदादित्यः सदा भासति भासति। नास्तमेति न चोदेति कथं सन्ध्यामुपास्महे॥
– मैत्रेयी उपनिषद् २। १३, १४