श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| ३०४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २२ सितम्बर, १८८३ |
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(२)
आद्याशक्ति की उपासना से ही ब्रह्म की उपासना होती है
– ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं
ईशान भाटपाड़ा में गायत्री का पुरश्चरण करेंगे। गायत्री ब्रह्ममन्त्र है। विषयबुद्धि बिलकुल लुप्त हुए बिना ब्रह्मज्ञान नहीं होता। परन्तु कलियुग में अन्नगत प्राण है – विषयबुद्धि छूटती नहीं। रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श – मन सदा इन्हीं विषयों को लेकर रहता है। इसलिए श्रीरामकृष्ण कहते हैं, 'कलि में वेद का मत नहीं चलता। जो ब्रह्म हैं, वे ही शक्ति हैं। शक्ति की उपासना करने से ही ब्रह्म की उपासना होती है। जिस समय वे सृष्टि, स्थिति, प्रलय करते हैं, उस समय उन्हें शक्ति कहते हैं। दो अलग अलग नहीं – एक ही हैं।'
श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) – क्यों 'नेति नेति' करके भटक रहे हो? ब्रह्म के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। केवल कहा जा सकता है, 'अस्तिमात्रम्*' 'केवलः रामः'।
"हम जो कुछ देख रहे हैं, सोच रहे हैं, सभी उस आद्याशक्ति का, उस चित्शक्ति का ही ऐश्वर्य है – सृजन, पालन, संहार, जीव, जगत्; फिर ध्यान, ध्याता; भक्ति, प्रेम, – सब उन्हीं का ऐश्वर्य है।"
"परन्तु ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं। लंका से लौटने के बाद हनुमान ने राम की स्तुति की थी। कहा था, 'हे राम, तुम्हीं परब्रह्म हो और सीता तुम्हारी शक्ति हैं। परन्तु तुम दोनों अभिन्न हो, जिस प्रकार सर्प और उसकी टेढ़ी गति, – साँप जैसी गति को सोचना हो तो साँप को सोचना होगा, और साँप को सोचने पर साँप की गति को भी सोचना पड़ता है। दूध का विचार करने पर दूध के रंग का – धवलत्व का विचार करना पड़ता है, और दूध की तरह सफेद अर्थात् धवलत्व को सोचने पर दूध का स्मरण लाना पड़ता है। जल की शीतलता का चिन्तन करते ही जल का स्मरण आता है और फिर जल के चिन्तन के साथ ही, जल की शीतलता का भी चिन्तन करना पड़ता है।"
"इस आद्याशक्ति या महामाया ने ब्रह्म को आवृत्त कर रखा है। आवरण हट जाते ही 'मैं जो था, वही बन गया।' 'मैं ही तुम, तुम ही मैं हूँ!'
"जब तक आवरण है, तब तक वेदान्तवादी की 'सोऽहम्' अर्थात् 'मैं ही परब्रह्म हूँ' यह बात नहीं चलती। जल की ही तरंग है, तरंग का जल नहीं कहलाता। जब तक
* नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा। अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति॥
— कठ उपनिषद, २। ३-१२-१३