श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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परिच्छेद ५३
अधर के मकान पर ईशान आदि भक्तों के संग में
(१)
बालक का विश्वास। अछूत जाति और शंकराचार्य।
साधु का हृदय
श्रीरामकृष्ण ने कलकत्ते में अधर के मकान पर शुभागमन किया है। आप अधर के बैठकघर में बैठे हैं। दिन के तीसरे पहर का समय है। राखाल, अधर, मास्टर, ईशान आदि तथा अनेक पड़ोसी भी उपस्थित हैं।
श्री ईशानचन्द्र मुखोपाध्याय को श्रीरामकृष्ण प्यार करते थे। वे अकाउण्टेण्ट जनरल के आफिस में सुपरिण्टेण्डेण्ट थे। पेन्शन लेने के बाद वे दान-ध्यान, धर्म-कर्म करते रहते थे और बीच बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते थे। मछुआबाजार स्ट्रीट में उनके मकान पर श्रीरामकृष्ण ने एक दिन आकर नरेन्द्र आदि भक्तों के साथ भोजन किया था और लगभग पूरे दिन रहे थे। उस उपलक्ष्य में ईशान ने अनेक लोगों को भी आमन्त्रित किया था।
श्री नरेन्द्र आनेवाले थे, परन्तु आ न सके। ईशान पेन्शन लेने के बाद श्रीरामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर में सर्वदा जाया करते हैं, और भाटपाड़ा में गंगातट पर निर्जन में बीच बीच में ईश्वरचिन्तन करते हैं। इस समय उनके मन में भाटपाड़ा में गायत्री का पुरश्चरण करने की इच्छा थी।
आज शनिवार, २२ सितम्बर १८८३ ई. है।
श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) – अपनी वह कहानी कहो तो – बालक ने पत्र भेजा था।
ईशान (हँसकर) – एक बालक ने सुना कि ईश्वर ने हमें पैदा किया है। इसलिए उसने अपनी प्रार्थना जताने के लिए ईश्वर के नाम पर एक पत्र लिखकर लेटर बक्स में डाल दिया। पता लिखा था – स्वर्ग! (सभी हँसे।)
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