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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 240 of 711

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Page 240
४ जून, १८८३परिच्छेद ३६२१७

बच्चा बकरियों के साथ पलने लगा। बकरियाँ घास खातीं तो वह भी घास खाता। बकरियाँ ‘में में’ करतीं तो वह भी करता। धीरे धीरे वह बच्चा बड़ा हो गया। एक दिन इन बकरियों के झुण्ड पर एक दूसरा बाघ झपटा। वह उस घास खानेवाले बाघ को देखकर आश्चर्य में पड़ गया। दौड़कर उसने उसे पकड़ा तो वह ‘में में’ कर चिल्लाने लगा। उसे घसीटकर वह जल के पास ले गया और बोला, ‘देख, जल में तू अपना मुँह देख। देख, मेरे ही समान तू भी है; और ले यह थोड़ासा माँस है, इसे खा ले।’ यह कहकर वह उसे बलपूर्वक खिलाने लगा। पर वह किसी तरह खाने को राजी न हुआ, ‘में में’ चिल्लाता ही रहा। अन्त में रक्त का स्वाद पाकर वह खाने लगा। तब उस नये बाघ ने कहा, ‘अब तूने समझा कि जो मैं हूँ वही तू भी है। अब आ, मेरे साथ जंगल को चल।’

“इसीलिए गुरु की कृपा होने पर फिर कोई भय नहीं। वे बतला देंगे, तुम कौन हो, तुम्हारा स्वरूप क्या है।

“थोड़ा साधन करने पर गुरु सब बातें साफ साफ समझा देते हैं। तब मनुष्य स्वयं समझ सकता है, क्या सत् है, क्या असत्। ईश्वर ही सत्य और यह संसार अनित्य है।”

कपट साधना भी बुरी नहीं

“एक धीवर किसी दूसरे के बाग में रात के समय चुराकर मछलियाँ पकड़ रहा था। मालिक को इसकी टोह लग गयी और दूसरे लोगों की सहायता से उसने उसे घेर लिया। मशाल जलाकर वे चोर को खोजने लगे। इधर वह धीवर शरीर में कुछ भस्म लगाए, एक पेड़ के नीचे साधु बनकर बैठ गया। उन लोगों ने बहुत ढूँढ़-तलाश की, पर केवल भभूत रमाए एक ध्यानमग्न साधु के सिवाय और किसी को न पाया। दूसरे दिन गाँव भर में खबर फैल गयी कि अमुक के बाग में एक बड़े महात्मा आए हैं। फिर क्या था, सब लोग फल, फूल, मिठाई आदि लेकर साधु के दर्शन को आए। बहुतसे रुपये-पैसे भी साधु के सामने पड़ने लगे। धीवर ने विचारा, आश्चर्य की बात है कि मैं सच्चा साधु नहीं हूँ, फिर भी मेरे ऊपर लोगों की इतनी भक्ति है! इसलिए यदि मैं हृदय से साधु हो जाऊँ तो अवश्य ही भगवान् मुझे मिलेंगे, इसमें सन्देह नहीं।

“कपट साधना से ही उसे इतना ज्ञान हुआ, सत्य साधना होने पर तो कोई बात ही नहीं। क्या सत्य है, क्या असत्य—साधना करने से तुम समझ सकोगे। ईश्वर ही सत्य हैं और सारा संसार अनित्य।”

एक भक्त चिन्ता कर रहे हैं, क्या संसार अनित्य है? धीवर तो संसार त्यागकर चला गया। फिर जो संसार में हैं उनका क्या होगा? उन लोगों को भी क्या त्याग करना होगा? श्रीरामकृष्ण अहेतुक कृपासिन्धु हैं, तत्काल कहते हैं, “यदि किसी आफिस के कर्मचारी को जेल जाना पड़े तो वह जेल में सजा काटेगा सही, पर जब जेल से मुक्त हो