Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 230 of 711

Read in context
Page 230
२ जून, १८८३परिच्छेद ३५२०७

“माँ, तुमसे कहा था, एक व्यक्ति को साथी बना दो, मेरे जैसे किसी को! इसीलिए राखाल को दिया है न?”

अधर के मकान पर हरिसंकीर्तन में

श्रीरामकृष्ण अधर के मकान पर आए हैं। मनोहर साँई के कीर्तन की तैयारी हो रही है।

श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए अधर के बैठकघर में अनेक भक्त तथा पड़ोसी आए हैं। सभी की इच्छा है कि श्रीरामकृष्ण कुछ कहें।

श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – संसार और मुक्ति दोनों ही ईश्वर की इच्छा पर निर्भर हैं। उन्होंने ही संसार में अज्ञान बनाकर रखा है। फिर जिस समय वे अपनी इच्छा से पुकारेंगे, उसी समय मुक्ति होगी। लड़का खेलने गया है, खाने के समय माँ बुला लेती है।

“जिस समय वे मुक्ति देंगे उस समय वे साधुसंग करा देते हैं और फिर अपने को पाने के लिए व्याकुलता उत्पन्न कर देते हैं।”

पड़ोसी – महाराज, किस प्रकार व्याकुलता होती है?

श्रीरामकृष्ण – नौकरी छूट जाने पर किरानी को जिस प्रकार व्याकुलता होती है! वह जिस प्रकार रोज आफिस आफिस में घूमता है और पूछता रहता है, ‘साहब, कोई नौकरी की जगह खाली हुई?’ व्याकुलता होने पर मनुष्य छटपटाता है – कैसे ईश्वर को पाऊँ!

“और यदि मूँछों पर हाथ फेरते हुए पैर पर पैर धरकर बैठे बैठे पान चबा रहा है – कोई चिन्ता नहीं, तो ऐसी स्थिति में ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती!”

पड़ोसी – साधुसंग होने पर क्या व्याकुलता हो सकती है?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, हो सकती है; परन्तु पाखण्डियों को नहीं होती। साधु का कमण्डल चारों धाम होकर आने पर भी कडुए का कड़ुआ ही रह जाता है!

अब कीर्तन शुरू हुआ है; गोस्वामीजी कलह-संवाद गा रहे हैं –

“श्रीमती कह रही हैं, ‘सखि! प्राण जाता है, कृष्ण को ला दे!’

“सखी – ‘राधे, कृष्णरूपी मेघ बरसता ही था; परन्तु तूने मान (प्रेमकोप –) रूपी आँधी से उस मेघ को उड़ा दिया। तू कृष्ण के सुख में सुखी नहीं है; नहीं तो मान क्यों करती?’

“श्रीमती – ‘सखि, मान तो मेरा नहीं है। जिसका मान है उसी के साथ चला गया है।’

“ललिता श्रीमती की ओर से कुछ कह रही है।” ‘सबने मिलकर प्रीत की ...