श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in contextपरिच्छेद ३५
भक्तों के मकान पर
(१)
बलराम के मकान पर श्रीरामकृष्ण। नरलीला का दर्शन और आस्वादन
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर से कलकत्ता आ रहे हैं। बलराम के मकान से होकर अधर के मकान पर और उसके बाद राम के मकान पर जाएँगे। अधर के मकान में मनोहर साँई का कीर्तन होगा। राम के घर पर कथा होगी। शनिवार, वैशाख कृष्णा द्वादशी, २ जून १८८३ ई.।
श्रीरामकृष्ण गाड़ी में आते आते राखाल, मास्टर आदि भक्तों से कह रहे हैं, “देखो, उन पर प्रेम हो जाने पर पाप आदि सब भाग जाते हैं, जैसे धूप से मैदान के तालाब का जल सूख जाता है।
संन्यासी और गृहस्थ - दोनों को विषयासक्ति छोड़नी होगी।
“विषय की वासना तथा कामिनी-कांचन पर मोह रखने से कुछ नहीं होता। यदि विषयासक्ति रहे तो संन्यास लेने पर भी कुछ नहीं होता - जैसे थूक को फेंककर फिर चाट लेना।”
थोड़ी देर बाद गाड़ी में श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं, “ब्राह्मसमाजी लोग साकार को नहीं मानते। (हँसकर) नरेन्द्र कहता है, 'पुत्तलिका!' फिर कहता है, 'वे अभी तक कालीमन्दिर में जाते हैं।'”
श्रीरामकृष्ण बलराम के घर पर आए हैं। वे एकाएक भावाविष्ट हो गए हैं। सम्भव हैं, देख रहे हैं, ईश्वर ही जीव तथा जगत् बने हुए हैं, ईश्वर ही मनुष्य बनकर घूम रहे हैं। जगन्माता से कह रहे हैं, “माँ, यह क्या दिखा रही हो? रुक जाओ; यह सब क्या दिखा रही हो? राखाल आदि के द्वारा क्या क्या दिखा रही हो, माँ! रूप आदि सब उड़ गया। अच्छा माँ, मनुष्य तो केवल ऊपर का ढाँचा ही है न? चैतन्य तुम्हारा ही है।
“माँ, आजकल के ब्राह्मसमाजी मीठा रस नहीं पाते! आँखें सूखी, मुँह सूखा! प्रेमभक्ति न होने से कुछ न हुआ!