श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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२०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत – १ २ जून, १८८३
अब कीर्तन में गोस्वामी कह रहे हैं कि सखियाँ राधाकुण्ड के पास श्रीकृष्ण की खोज करने लगीं। उसके बाद यमुनातट पर श्रीकृष्ण का दर्शन, साथ में श्रीदाम, सुदाम, मधुमंगल। वृन्दा के साथ श्रीकृष्ण का वार्तालाप, श्रीकृष्ण का योगी का-सा भेस, जटिला-संवाद, राधा का भिक्षादान, राधा का हाथ देख योगी द्वारा गणना तथा संकट की भविष्यवाणी। कात्यायनी की पूजा में जाने की तैयारी।
कीर्तन समाप्त हुआ। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – गोपियों ने कात्यायनी की पूजा की थी। सभी उस महामाया आद्याशक्ति के अधीन हैं। अवतार आदि तक उस माया का आश्रय लेकर ही लीला करते हैं; इसीलिए वे आद्याशक्ति की पूजा करते हैं। देखो न, राम सीता के लिए कितने रोये हैं। पंचभूतों के फन्दे में पड़कर ब्रह्म रोते हैं।
“हिरण्याक्ष का वध कर वराह-अवतार कच्चे-बच्चे लेकर रह रहे थे। आत्मविस्मृत होकर उन्हें स्तनपान करा रहे थे! देवताओ ने परामर्श करके शिवजी को भेज दिया। शिवजी ने त्रिशूल के आघात से वराह का शरीर विनष्ट कर दिया; तब वे स्वधाम में पधारे। शिवजी ने पूछा था, ‘तुम आत्मविस्मृत क्यों हो गये हो?’ इस पर उन्होंने कहा था, ‘मैं बहुत अच्छा हूँ’!”
अधर के मकान से होकर अब श्रीरामकृष्ण राम के मकान पर जा रहे हैं।
(२)
रामचन्द्र दत्त के मकान पर
श्रीरामकृष्णदेव सिमुलिया मुहल्ले की मधु राय की गली में रामबाबू का मकान है। रामचन्द्र दत्त श्री रामकृष्णदेव के विशिष्ट भक्त हैं। वे डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त कर मेडिकल कालेज में रसायनशास्त्र के सहकारी परीक्षक नियुक्त हुए थे और ‘साइन्स असोसिएशन’ में रसायनशास्त्र के अध्यापक भी थे। उन्होंने स्वोपार्जित धन से यह मकान बनवाया था। इस मकान में श्रीरामकृष्णदेव कुछ एक बार आये थे, इसीलिए यह मकान भक्तों के लिए आज तीर्थ के समान महान् पवित्र है। रामचन्द्र गुरुदेव की कृपा लाभ कर ज्ञानपूर्वक संसारधर्म पालन करने की चेष्टा करते थे। श्रीरामकृष्णदेव मुक्तकण्ठ से रामबाबू की प्रशंसा करते और कहते थे, – ‘राम अपने मकान में भक्तों को स्थान देता है, कितनी सेवा करता है, उसका मकान भक्तों का एक अड्डा है।’ नित्यगोपाल, लाटू, तारक आदि एक प्रकार से रामचन्द्र के घर के आदमी हो गये थे। इन्होंने उनके साथ बहुत दिनों तक एकत्र वास किया था। इसके सिवाय उनके मकान में प्रतिदिन नारायण की पूजा और सेवा होती थी।
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