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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 228 of 711

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Page 228
२७ मई, १८८३परिच्छेद ३४२०५

श्रीरामकृष्ण भोजन के बाद विश्राम भी न कर सके थे कि मनोहर साँई गोस्वामी आ पधारे।

श्रीराधा के भाव में महाभावमय श्रीरामकृष्ण। क्या श्रीरामकृष्ण गौरांग हैं?

गोस्वामी पूर्वराग का कीर्तन गा रहे हैं। थोड़ा सुनकर ही श्रीरामकृष्ण राधा के भाव में भावाविष्ट हो गए।

पहले ही गौरचन्द्रिका-कीर्तन। “हथेली पर हाथ – चिन्तित गोरा – आज क्यों चिन्तित हैं? सम्भवतः राधा के भाव में भावित हुए हैं।”

गोस्वामी फिर गा रहे हैं –

(भावार्थ) – “घड़ी में सौ बार, पल पल में घर से बाहर आती और फिर भीतर जाती है। कहीं पर भी मन नहीं लग रहा है, जोर जोर से श्वास चल रहा है, बार बार कदम्ब-कानन की ओर ताकती है। राधे, ऐसा क्यों हुआ?”

संगीत की इसी पंक्ति को सुन श्रीरामकृष्ण की महाभाव की स्थिति हुई है! उन्होंने अपनी कमीज को फाड़कर फेंक दिया।

कीर्तनकार फिर गा रहे हैं – ‘तेरा अंग शीतल है...’

कीर्तनकार का संगीत सुनते सुनते महाभाव में श्रीरामकृष्ण काँप रहे हैं! केदार को देख वे कीर्तन के स्वर में कह रहे हैं, “प्राणनाथ, हृदयवल्लभ, तुम लोग मुझे कृष्ण ला दो; यही तो मित्रता का काम है; या तो उन्हें ला दो और नहीं तो मुझे ले चलो; तुम लोगों की मैं चिरकाल के लिए दासी बनी रहूँगी।”

गोस्वामी कीर्तनिया श्रीरामकृष्ण के महाभाव की स्थिति को देखकर मुग्ध हुए हैं। वे हाथ जोड़कर कह रहे हैं, “मेरी विषयबुद्धि मिटा दीजिए।”

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – तुम उस साधु के सदृश हो जिसने पहले रहने की जगह ठीक कर, फिर शहर देखना शुरू किया। तुम इतने बड़े रसिक हो, तुम्हारे भीतर से इतना मीठा रस निकल रहा है।

गोस्वामी – प्रभो, मैं चीनी का बोझ ढोनेवाला बैल हूँ, चीनी का आस्वादन कहाँ कर सका?

फिर कीर्तन होने लगा। कीर्तनकार श्रीमती राधिका की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं – “कोकिलकुल कुर्वति कलनादम्।”

कोकिल का कलनाद श्रीमती को वज्रध्वनि जैसा लग रहा है। इसलिए वे जैमिनी का नाम उच्चारण कर रही हैं और कह रही हैं, ‘सखि, कृष्ण के विरह में यह प्राण नहीं रहेगा; इस देह को तमाल वृक्ष की शाखा पर रख देना।’

गोस्वामी ने राधाश्याम का मिलन गाकर कीर्तन समाप्त किया।