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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 430 of 519

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Page 430

तृतीयः निष्यन्दः ३२९
यह सब आत्मसंवित् की ही विशेषाभिव्यक्ति है। अपने स्वरूप में स्थिति अर्थात्
सबके स्वरूप में स्थिति है। कभी स्वरूप से च्युति नहीं होती। यही युक्ति है जिससे
सर्वत्र सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता आदि अभिव्यक्त हो जाते हैं। कहा भी गया है—
एक ही भाव सबका स्वभाव है। सभी भाव एक ही भाव के स्वभाव हैं। जिसने
एक ही भाव को तत्त्वतः अनुभव कर लिया उसने सभी भावों को तत्त्वतः अनुभव
कर लिया—
एको भावः सर्वभावस्वभावः सर्वे भावा ह्येकभावस्वभावाः ।
एको भावस्तत्त्वतो येन दृष्टः सर्वे भावास्तत्त्वतस्तेन दृष्टाः ॥
इस संबन्ध में एक रहस्य-युक्ति है कि जिस-जिस शरीर में संवित् दृढ़ता प्राप्त
करेगा वहीं-वहीं उसके समस्त गुण प्रकट हो जाएँगे—
‘रहस्ययुक्तिरत्रेयं शरीरे यत्र यत्र च ।
संविदो दार्ढ्यलाभः स्यात्तत्र तत्र गुणोदयः ॥१
सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्व आदि गुणों की अभिव्यक्ति के उपायों को प्रतिपादित करके
कारिकाकार अब एक उपपत्ति के निदर्शन के द्वारा उसे प्रदर्शित कर रहा है।
अनेन = इस चेतन आत्मा के द्वारा।
अधिष्ठिते = अधिष्ठित होने पर।
मैं हूँ—इस प्रतिपत्ति के द्वारा अध्यासित होने पर, देहे = शरीर के।
सर्वज्ञतादयः = सर्वज्ञातृत्व आदि। शरीराश्रित समस्त ज्ञेय कार्य। सर्व+ज्ञता ।
‘ज्ञता’ = ज्ञातृत्वादिक जिसमें हों वे वे ही कर्तृत्वादिक धर्म। यथा = जिस प्रकार। सभी
में स्थित हैं।
व्यक्ति केवल अपने शरीर के स्तर पर ही सर्वज्ञ नहीं हो जाता प्रत्युत् वह सर्वत्र
सर्वज्ञ हो जाता है। यह आत्मा जिस जिस भी पदार्थ को अहं के रूप में स्वीकार
करता जाता है वे सभी उसके शरीर बनते जाते हैं और समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म पदार्थ
उसके आश्रित होते जाते हैं। वह इन सभी को जानने लगता है और सभी कार्य करने
लगता है।
तथैव = उसी प्रकार, देह की अहं के रूप में स्वीकार करने या अहं को
देहाधिष्ठान मानने की भाँति ।२
ग्लानि और उसकी निवृत्ति—
ग्लानिर्विलुण्ठिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः ।
तदुन्मेषविलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥ ४० ॥
१. उत्पलदेवाचार्य— ‘स्पन्दप्रदीपिका’। २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति'।