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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 431 of 519

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Page 431

३३० स्पन्दकारिका
औदासीन्य (मानसिक क्षोभ) शरीर में (धातु, बल, उत्साह, तेज शक्ति आदि)
सभी कुछ नष्ट कर देने वाली है और उसका प्रसार अज्ञान से होता है । यदि वह उन्मेष
के द्वारा उन्मूलित कर दी जाय तो कारण का अभाव होने से (वह) कहाँ से उत्पन्न हो
पायेगी? ॥ ४० ॥

  • सरोजिनी *
    अज्ञानतः सूतिः = अज्ञान से संसरण चक्र का प्रादुर्भाव होता है । बौद्ध धर्म में
    भी इसे 'अविद्या' के रूप में ग्रहण किया गया है । 'भवचक्र' की प्रथम श्रृंखला 'अविद्या'
    मानी गई है ।
    विलुप्तं = 'विच्छिन्नं । निर्मूलतां नीतं ॥' (रामकण्ठाचार्य)
    उन्मेषेण = स्वभावालोकविकासेन (रामकण्ठाचार्य)
    विलुण्ठिका = धातुबलवर्णतेजःशक्त्यादीनां हठेन हर्त्री ॥ (रामकण्ठाचार्य)
    सूतिः = सरणं, प्रवृत्तिः ।
    ग्लानि = हर्षक्षति अनुत्साहरूपा । (उत्पलाचार्य) ॥
    विलुण्ठिका = विलुम्पिका । विनाशिनी । (उत्पलाचार्य) ॥
    भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की
    है—'ग्लानिः किल शरीरस्य विनाशिनी । सा च ग्लानिरज्ञानादुत्पद्यते । तदज्ञानम्
    उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योझितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत्? अनेनैव
    कारणेन वलीपलितभावः शरीरदाढर्यं च योगिनाम् ॥१
    उन्मेषेन = आत्मस्वभावेन (उत्पलाचार्य) दुःख की अनुभूति शरीर का चोर है ।
    यह अज्ञान से उत्पन्न होती है । यदि यह अज्ञान उन्मेष के द्वारा विलुप्त होता है तो अपने
    कारण के अभाव में यह दुःख भला कहाँ रह सकता है ?
    दुःख की भावना जो कि व्यक्ति अपने शरीर को अपनी आत्मा मानकर अनुभव
    करता है—चोर की भाँति कार्य करती है जब कि यह पूर्णज्ञान के धन को चुराती है एवं
    बन्धन रूपा निर्धनता देती है । दुःखोत्पत्ति एवं उसकी सत्ता अज्ञान के कारण या आनन्द
    एवं ज्ञान से अभिन्न अपने आत्मस्वरूप की अप्रत्यभिज्ञा (Non recognition) के
    कारण होती है ।
    अज्ञान एवं अप्रत्यभिज्ञान एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं ।
    दुःखों के नष्ट हो जाने पर शरीर के अपरिहार्य दुःख भय भोग लुप्त हो जाते हैं
    और इनके लुप्त होने के अनुपात में योगी का यथार्थ स्वरूप उसी प्रकार प्रकट हो जाता
    है यथा स्वर्ण के तपाये जाने पर एवं उसके मल के नष्ट होने पर स्वर्ण अपने यथार्थ
    स्वरूप में प्रकट होता है अतः योगी का महत्तम धन है—अपनी दैहिक सत्ता में भी
    दुःखात्यन्ताभाव । जैसा कि योगिनी मदालसा ने भी कहा है कि—
    १. स्पन्दकारिकावृत्ति (कल्लट) ।