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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 303 of 519

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Page 303

२०२ स्पन्दकारिका
भावसत्ता होने के कारण अभाववाद संगत नहीं है। 'सब कुछ अभावात्मक है—' अभाव
ही परम यथार्थ है—अनस्तित्त्व ही परम सत्य है'—इस सर्वाभाववाद का साक्षी या
अनुभविता कौन है? इसका अनुभविता या साक्षी 'भाव' (सत्तासीन वस्तु) ही तो होगा—
यह आत्मा ही 'भाव' है अतः अभाववाद अज्ञता की दृष्टि है। यह भाव सत्ता (आत्मा)
ही किसी अभाव को अभाव (न होने के भाव = अनस्तित्त्व) के रूप में सत्ता प्रदान करके
(अर्थात् अभाव के रूप में स्थित मानकर) उसका (भावशून्यता का, अनस्तित्त्व का,
अभाव का) अनुभव करती है। अतः वेदक सत्ता का किसी भी अवस्था में लोप नहीं हो
सकता। यह वेदक सत्ता ही आत्मा है। अतः 'सर्वाभाववाद' मिथ्या कल्पना है।
समाधि में सर्वाभाववाद की अनुभूति नहीं होती। समाधि में केवल कार्यता
('कार्योन्मुख प्रयास') का लोप होता है। स्पन्दात्मिका कर्तृता (वेदकता) बाह्य प्रमेय
समूह की ओर प्रवृत्तोन्मुख न होने के कारण अपने ही कार्यता अंश को अपने में ही
विलीन करके, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में स्थित हो जाती है। अप्रबुद्ध योगी ही समाधि
दशा में कार्यता के लुप्त होने पर यह समझते हैं कि हम भी लुप्त हो गए या अभाव में
विलीन हो गए। 'स्वभाव' (आत्म सत्ता) का लोप कभी नहीं होता ॥
समाधि की अवस्था में कार्यता सम्बद्ध स्पन्दतत्त्व की स्थिति—आचार्य
अभिनवगुप्तपाद कहते हैं कि विशुद्ध चिन्मात्र स्पन्द तत्त्व अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' के
कारण प्रत्येक काल खण्ड में 'वेदक' एवं 'वेद्य' दोनों स्वरूपों में नित्य अवभासित रहता
है अर्थात् वह एक ही साथ एवं एक ही समय—कार्यता एवं कर्तृता दोनों अवस्थाओं में
स्पन्दमान रहता है। अन्तर यह है कि एक परिणामी, क्षयिष्णु, परिवर्तनशील अवस्था है
जब कि दूसरी अपरिणामिनी, अक्षर एवं अपरिवर्तनशील तथा नित्य अवस्था है।
कार्योन्मुख प्रयत्न समाधिकाल में लुप्त हो जाता है और इस स्थिति में अभा-
वात्मक स्थिति का भी बोध होने लगता है अतः ऐसे योगी अभाव को ही परमसत्
(पारमार्थिक सत्ता) मानकर 'अभाववाद' का प्रतिपादन करने लगते हैं किन्तु यह उनका
भ्रम है क्योंकि परमार्थ सत् या पारमार्थिकी सत्ता अभावात्मक नहीं भावात्मक है।
भट्टकल्लट प्रस्तुत कारिका (क्र०१५) की व्याख्या करते हुए कहते हैं—'कार्य-
संपादनसामर्थ्य बाह्यकरण व्यापाररूपं केवलं विलुप्यते, स्थगितेन्द्रियस्य तस्मिन् विलुप्ते
सामर्थ्ये 'स्वभावों में विलुप्त'—इति अबुधो जानाति, न तु भावस्य विनाशोऽस्ति ।'
समाधि के समय बहिर्मुख कार्य के प्रति, प्रमाता की उन्मुखता लुप्त हो जाती है।
इस विलुप्तता की स्थिति में समस्त वाह्य वेद्य़ों की अनुभूति का अभाव होने के कारण
योगी को ऐसा प्रतीत होने लगता है कि 'मैं विलुप्त हो गया हूँ अर्थात् मेरा अभाव हो
गया है।' अपने स्वभाव की ही विलुप्तता का भ्रम योगी को अभाववादी बना देता है
किन्तु अभावात्मकता प्रबुद्ध योगी को नहीं प्रत्युत् अबुध योगी को होता है क्योंकि प्रमेय
जगत् का ज्ञान (संवेदन) विलुप्त होने पर 'स्वभाव' विलुप्त नहीं होता तथा अन्तर्जगत में
अभाव नहीं विशुद्ध चिन्मय सत्ता का उदय भी तो होता है। बहिर्मुख जगत् एवं बहिर्मुखी
जागतिक अवस्थाओं एवं संवेदनाओं मात्र से तादात्म्य रखने के कारण उसे ही अपना