स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
Page 304 of 519
Read in contextप्रथमः निष्यन्दः २०३
सत्स्वरूप मानने की भ्रान्ति के कारण ही ऐसे अबुध योगी को (बाह्य जगत् एवं जागतिक
अनुभवों के अभाव एवं समाधि में संदृष्ट आत्मज्योति को स्वस्वभाव न मानने के कारण)
अपने स्वस्वभाव का अभाव (अपनी वास्तविक सत्ता की विलुप्तता) का भ्रान्त अनुभव
होने लगता है।
अभाववाद और उसका प्रत्याख्यान—तस्मिँल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रति-
पद्यते। (का० १५) कहकर कारिकाकार ने 'अभाववाद' का खण्डन किया है। माहा-
यानिक शून्याद्वैतवादियों के शून्यवाद का भी इसी के द्वारा प्रतिषेध एवं प्रत्याख्यान
किया गया है।
समाधिकाल में बाह्योन्मुखी कार्य करने की क्षमता। बाह्यवर्ती (जागतिक) संवेद-
नाओं की अनुभूति का अभाव एवं जागतिक मित अहंता के अभाव के कारण अबुध
योगी अपने स्वरूप के ही अभाव की कल्पना करके अभाव को ही परम सत्य स्वीकार
करने की भूल कर बैठता है। किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि उसकी अपनी सत्ता
एवं उसका सत्स्वरूप तो त्रिकालाबाधित एवं अक्षर सत्य है।
अभाववादी दार्शनिक कहते हैं कि किसी भी पदार्थ की नित्य सत्ता नहीं है सभी
की केवल प्रातिभासिक या व्यावहारिक सत्ता मात्र है इसी प्रकार प्रत्यक चैतन्य (आत्म
संवित्) भी अनित्य है। बौद्धों ने तो कहा था—'आत्म! ध्वंसो हि मोक्षः' (सर्वदर्शनसं.)।
अभाववाद—अभाववादी अनस्तित्ववादी हैं। वे अनस्तित्त्व—आत्म प्रत्याख्यान-
स्वस्वभाव का निषेध को ही सत्य मानते हैं अतः ध्यानावस्था में 'मेरा अस्तित्व नहीं है—
मैं नहीं हूँ'—की भावना का ही अभ्यास किया करते हैं। जड़ समाधि की अवस्था में जब
उनका जगत् से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, इन्द्रियाँ अपने विषयों से विरत हो जाती है,
बाह्योन्मुखी समस्त व्यापार बन्द हो जाते हैं, समस्त बाह्य संवेदन लुप्त हो जाते हैं तथा
व्युत्थानावस्था में प्राप्त जागतिक 'स्वं की प्रत्यभिज्ञा का भी अन्त हो जाता है तब ऐसा
अबुध योगी अपनी प्रत्यभिज्ञा की कोई भी वस्तु न पाकर, किसी भी वाह्य पदार्थ से
तादात्म्यापत्ति न होने से सर्वत्र अभाव ही अभाव देखता है इसी कारण वह अभाव को ही
पारमार्थिक सत्य मानने लगता है। वह अपनी आत्मा ('मैं') को भी अभाव में लयीभूत
मानने लगता है।
केवल सुप्रबुद्ध योगी ही 'शांभवोपाय', 'अनुपाय', 'शाक्तोपाय' या 'शक्तिपात'
(गुरुकृपा) से तुरीय शाक्त भूमि का संदर्शन करने में समर्थ हो पाता है।
प्रश्न—'कार्योन्मुख प्रयत्न' के लुप्त हो जाने से यदि कर्तृत्वांश का भी लोप हो
जाता तो अभाव दशा का साक्षी कौन होता? कौन जान पाता कि (समाधि में बाह्येन्द्रियों
द्वारा अपने शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध को ग्रहण न कर पाने एवं चेतना के बहिर्मुखता से
निवृत्त होकर अन्तर्मुखता प्राप्त करने के समय) 'मैं' का अस्तित्व विलुप्त हो गया है—
आत्मा 'अभाव' में विलुप्त हो गई है?
यदि 'अभाव' की दशा में भी अभाव का साक्षी (अभावावस्था के अस्तित्व का
संवेदक) कोई है तो वह कौन है? वही तो भाव रूप आत्मसत्ता है। फिर 'अभाव'