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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 302 of 519

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Page 302

प्रथमः निष्यन्दः २०१
स्पर्श-रूप-रस-गंध आदि पंच महाविषयों को जो ग्रहण करती हैं वह क्षमता लुप्त हो जाती
है अर्थात् इन्द्रियों में विषय-ग्रहण की क्षमता का तिरोधान हो जाता है। अज्ञ यह समझने
लगता है कि इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण की क्षमता के लोप के कारण मेरा भी लोप हो गया
है—यह अनुभव मात्र अज्ञान है क्योंकि नित्य स्वभाव का कभी लोप नहीं होता—
'कार्यसंपादनसामर्थ्यं बाह्यकरणव्यापाररूपं केवलं विलुप्यते', स्थगितेन्द्रियस्य
तस्मिन् विलुप्ते सामर्थ्ये, 'स्वभावों में विलुप्त'—इति अबुधो जानाति, न तु भावस्य
विनाशोस्ति ॥'१
कारिकाकार कहते हैं कि समाधिकाल में व्यक्ति के इन्द्रियों की कार्यसम्पादनो-
न्मुख अध्यवसाय (कार्योन्मुख प्रयत्न) ही रुकता है—जीव की बहिर्मुखी कार्यता या
चिकीर्षा का प्रयास या क्रियान्वय रुकता है किन्तु उसके लुप्त होने से यह सोचना कि 'मैं
ही विलुप्त हो गया हूँ'—ऐसा अनुभव तो केवल अज्ञानियों को होता है अन्य को नहीं ॥
अभाववाद का खण्डन—अभाववादी दार्शनिक यह मानते हैं कि सारे 'भाव'
काल्पनिक हैं—अध्यारोपित हैं—अध्यास है और सत्य मात्र—'अभाव' है। जो कुछ भी
है—यथा शरीर, शरीरांग, इन्द्रियाँ, उनकी अनुभूतियाँ, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति आदि अव-
स्थायें, सुख, दुःख, बाल्य-यौवन-वार्धक्य, जीवन, मरण लिंगभेद, स्वर्ग-नरक, बन्धन-
मुक्ति आदि सभी क्षणभंगुर हैं और कतिपय काल तक ही अस्तित्व में रहते हैं बाद में
उनका अभाव हो जाता है—कोई भी भाव स्थायी नहीं होता अतः 'अभाव' ही सत्य
है—अनस्तित्व ही परम यथार्थ है। अभाववादी आत्मा को भी स्थायी एवं नित्य भाव की
वस्तु नहीं मानते। उनका कथन है—'आत्मा ध्वंसो हि मोक्षः ॥'२
अभाववादी पदार्थों के अनस्तित्व को परम सत्य स्वीकार करते हैं। अभाववादी
ध्यान करते हैं—'मैं नहीं हूँ, मेरा भाव (अस्तित्त्व) नहीं है।' इस प्रकार की भावना का
अभ्यास करने वाले ये अभाववादी जब कभी समाधि में पहुँचते हैं तो इन्द्रियों का अपने
व्यापारों से विरत हो जाने पर—बाह्य विषयों की अनुभूति का अभाव होने पर—शब्द-
स्पर्श-रूप-रस-गंध विषयों को ग्रहण न कर पाने के कारण यह समझते हैं कि मेरा जो
'मैं' (आत्मा) था उसका भी अभाव हो गया है। तुरीय शाक्त भूमिका पर आरूढ़ योगी
ज्ञान-क्रियासमन्विता स्पन्दन का अनुभव करते रहने के कारण सदैव वेदक होने का
अनुभव करता रहता है।
यह जो 'कार्योन्मुख प्रयत्न' लुप्त हो जाता है यदि इसके साथ ही वेदक (प्रमाता)
को अपने कर्तृत्व अंश का भी लोप अनुभव में आ जाता तो अभाववाद संगत माना
जाता किन्तु प्रश्न यह है कि यदि इस कर्तृत्वांश का भी लोप संभव हो जाय तो इस लोप
का अनुभव कौन करेगा? यह अनुभविता ही 'कर्ता' है, आत्मा है—भाव है। फिर
अभाववाद कैसा? किसी वस्तु के लुप्त होने की अनुभूति का वेदक भी तो कोई न कोई
होगा? यह वेदक (आत्मा) भाव सत्ता (अस्तित्त्व) ही तो है। यदि आत्मा भी अभाव
(सत्ताहीन) मान ली जाय तो लोप (अभाव) की अनुभूति किसको होगी? अतः आत्मा के
१. 'स्पन्दसर्वस्व' : भट्टकल्लट। २. 'सर्वदर्शनसंग्रह' (माधवाचार्य)।